उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज होती जा रही है। समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) अब अपनी राजनीतिक छवि बदलने की कोशिश में जुटे दिखाई दे रहे हैं। लंबे समय से सपा की पहचान मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण वाली पार्टी के रूप में रही है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी चुनावों में इसी मुद्दे को लगातार उठाती रही है। अब बदलते राजनीतिक माहौल के बीच अखिलेश नए सामाजिक समीकरण और सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति पर काम करते नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अखिलेश यादव अब खुद को केवल मुस्लिम-यादव राजनीति तक सीमित नेता के रूप में नहीं दिखाना चाहते। इटावा (Etawah) में केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर ‘श्री केदारेश्वर महादेव मंदिर’ बनवाने और पंडितों-ज्योतिषियों की सलाह का खुलकर जिक्र करने को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
विरासत में मिली मुस्लिम-यादव छवि:
समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय तक मुस्लिम और यादव वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही। 1990 में अयोध्या (Ayodhya) में कारसेवकों पर गोलीकांड के बाद भाजपा ने मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) को ‘मुल्ला मुलायम’ कहकर निशाना बनाना शुरू किया था। इसके बाद सपा की पहचान मुस्लिम-यादव समीकरण वाली पार्टी के रूप में मजबूत होती गई।
जब अखिलेश यादव ने पार्टी की कमान संभाली, तब उन्हें भी इसी वोटबैंक के प्रतिनिधि नेता के रूप में देखा गया। 2013 के मुजफ्फरनगर (Muzaffarnagar) दंगों के दौरान सपा सरकार के फैसलों को लेकर भाजपा ने उन पर मुस्लिम समुदाय के प्रति नरम रुख अपनाने के आरोप लगाए थे। उस समय दंगा प्रभावित मुस्लिम परिवारों को मुआवजा देने के फैसले पर भी विवाद हुआ था।
अब मंदिर और सनातन की राजनीति पर फोकस:
अब अखिलेश यादव की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। इटावा में बन रहा ‘श्री केदारेश्वर महादेव मंदिर’ इसी बदलाव का अहम हिस्सा माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि यह मंदिर उत्तराखंड (Uttarakhand) के प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है। अखिलेश यादव खुद इस मंदिर के मुख्य ट्रस्टी बताए जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के जरिए अखिलेश भाजपा के उस नैरेटिव को चुनौती देना चाहते हैं, जिसमें उन्हें केवल मुस्लिम हितों से जुड़ा नेता बताया जाता रहा है। चुनावी साल में मंदिर उद्घाटन की योजना को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
पंडित और ज्योतिष के सहारे नई रणनीति:
हाल ही में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश यादव ने कहा था कि अब वह हर कदम पंडितों और ज्योतिषियों की सलाह पर उठा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2012 में भी पंडितों और ज्योतिषियों के मार्गदर्शन में उनकी सरकार बनी थी और अब वह फिर उसी रास्ते पर चल रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अखिलेश यादव के इस बयान का मकसद ब्राह्मण समाज को संदेश देना भी है। कहा जा रहा है कि वह खुद को सनातन परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं से जुड़ा नेता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।
PDA फॉर्मूले को विस्तार देने की तैयारी:
2024 लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने ‘PDA’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा दिया था। इस रणनीति के तहत उन्होंने यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या सीमित रखते हुए अन्य पिछड़ी जातियों और दलित समाज को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस प्रयोग का फायदा सपा को मिला और पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूत स्थिति में पहुंची।
अब माना जा रहा है कि 2027 विधानसभा चुनाव में अखिलेश इसी फॉर्मूले को और विस्तार देने की तैयारी कर रहे हैं। इसके तहत सवर्ण समाज को भी साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है। सॉफ्ट हिंदुत्व और मंदिर राजनीति को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
टिकट वितरण में हो सकते हैं बड़े बदलाव:
सपा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक 2027 विधानसभा चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या पहले की तुलना में कम हो सकती है। 2024 लोकसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी ने सीमित मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था। माना जा रहा है कि यही रणनीति विधानसभा चुनाव में भी अपनाई जा सकती है।
पार्टी का मानना है कि ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारने से भाजपा को ध्रुवीकरण का मुद्दा मिल सकता है। ऐसे में अखिलेश यादव अब व्यापक सामाजिक समीकरण बनाकर चुनावी रणनीति तैयार कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक जानकार यह भी मानते हैं कि यह रणनीति जोखिम भरी हो सकती है, क्योंकि इससे पार्टी के पारंपरिक वोटबैंक पर असर पड़ने की संभावना भी बनी रहेगी।
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