Video: गाज़ीपुर: ओवरलोड वाहनों के खेल में तड़पती रहीं जिंदगियां…

भारत में ट्रैफिक जाम अब केवल असुविधा नहीं बल्कि जानलेवा स्थिति बन चुकी है। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं, जहाँ एम्बुलेंस (Ambulance) ट्रैफिक (Traffic) में फँस जाने के कारण मरीज अस्पताल नहीं पहुँच पाए और रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। हालिया वर्षों में मीडिया रिपोर्ट्स (Media Reports) के अनुसार, 2024–2025 के बीच ही देशभर में 10 से 20 ऐसी घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें एम्बुलेंस में फँसे मरीजों की जान चली गई।

GVK EMRI की रिपोर्ट बताती है कि ट्रैफिक की वजह से कई शहरों में एम्बुलेंस की गति 75% तक घट जाती है। भारत में 108 आपातकालीन सेवा हर साल करीब 80 लाख मरीजों को ले जाती है, जिनमें से लगभग 10% मरीज गंभीर अवस्था में होते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि इनमें से केवल 0.1% मरीज भी ट्रैफिक में फँसने के कारण समय पर अस्पताल न पहुँच पाने से मरते हैं, तो हर साल लगभग 800 मौतें केवल इसी कारण से हो सकती हैं। वहीं अगर यह अनुपात 2% तक माना जाए, तो यह आंकड़ा 16,000 तक पहुँच जाता है। अब तक भारत सरकार या राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के पास ट्रैफिक-जाम से हुई मौतों का कोई अलग आधिकारिक डेटा मौजूद नहीं है।

गोल्डन ऑवर बन रहा ‘डेड ऑवर’:
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि किसी भी गंभीर दुर्घटना या हार्ट अटैक के बाद शुरुआती एक घंटे को “गोल्डन ऑवर” कहा जाता है। इस दौरान यदि मरीज को इलाज मिल जाए तो उसकी जान बचाई जा सकती है। लेकिन भारत के महानगरों से लेकर छोटे शहरों और हाईवे तक फैले ट्रैफिक-जाम इस “गोल्डन ऑवर” को “डेड ऑवर” में बदल रहे हैं।

गाजीपुर की तस्वीर ने बढ़ाई चिंता:
अब यह समस्या केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों में भी नियमों की अनदेखी और भारी वाहनों का अनियंत्रित आवागमन ट्रैफिक की स्थिति को भयावह बना रहा है। उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर (Ghazipur) से हाल ही में आई एक तस्वीर ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गाजीपुर में गंगा नदी पर बने वीर अब्दुल हमीद सेतु (Veer Abdul Hameed Setu) पर भारी वाहन नियमों का उल्लंघन कर गुजरते हैं, जिससे न केवल जाम की स्थिति पैदा होती है बल्कि पुल के क्षतिग्रस्त होने का खतरा भी बढ़ जाता है। बुधवार को आई एक घटना में जाम के बीच कई एम्बुलेंस फँसी रहीं, जिनमें गंभीर मरीज मौजूद थे। इस स्थिति ने लोगों के बीच आक्रोश और चिंता दोनों बढ़ा दी है।

आइए समझते हैं जाम का कारण:
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वीर अब्दुल हमीद सेतु पर ओवरलोड वाहनों के आवागमन पर प्रतिबंध लगाने के लिए छह वर्ष पहले दोनों छोर पर हाइटगेज बैरियर (Height Gauge Barrier) लगाए गए थे। इनकी निगरानी के लिए चार सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए थे। लेकिन अब रजागंज की तरफ केवल एक कैमरा काम करता दिख रहा है। यही नहीं, लोहे के एंगल को टेढ़ा कर वाहन चालक आसानी से ओवरलोड ट्रेलर पार करा रहे हैं। प्रतिदिन 100 से 150 बालू लदे ओवरलोड ट्रेलर और 700 से अधिक वाहन इस पुल से गुजरते हैं। पांच वर्ष पहले तत्कालीन जिलाधिकारी ने इस पर कार्रवाई की थी, लेकिन अब जिम्मेदारों की कार्रवाई केवल कागजों तक सिमट गई है।

सुबह ट्रेलरों की संख्या कम होती है, पर शाम होते-होते दोगुनी हो जाती है। रात भर ओवरलोड ट्रेलरों का आवागमन बना रहता है। यह पुल बिहार और चंदौली (Chandauli) सहित जनपद के दो प्रमुख तहसील—जमानिया और सेवराई—को जोड़ता है। इसे सुरक्षित रखने के लिए लगाए गए बैरियर अब बेअसर हो चुके हैं। समाजसेवी दीपक उपाध्याय का कहना है कि रजागंज चौकी के पास लगे सीसीटीवी कैमरों में से अब केवल एक ही कैमरा बचा है, जो दिखने को तो है लेकिन उसकी निगरानी होती भी है या नहीं, यह कहना मुश्किल है।

जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल:
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कुछ व्यापारियों के लिए नियमों को क्यों ताक पर रखा जा रहा है? यह कोई नई समस्या नहीं है। अधिकारी बदलते रहे लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। लोगों का कहना है कि अब प्रशासन और जनप्रतिनिधि जनता की सेवा करने के बजाय उस पर राज करने के ख्वाब देखने लगे हैं।

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Disclaimer: यह खबर स्थानीय संवाददाता, मीडिया प्लेटफॉर्म या अन्य माध्यमों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

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