उत्तर प्रदेश में अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार की नीति लंबे समय से चर्चा में रही है। पुलिस मुठभेड़, गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती और गैंगस्टर अधिनियम जैसे कड़े कानूनों के इस्तेमाल को अपराध के खिलाफ कार्रवाई का हिस्सा बताया गया है। इसी बीच उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की टिप्पणी सामने आई है। अदालत ने इस कानून के प्रावधानों में कमियों और इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दो वकीलों के खिलाफ इस अधिनियम के तहत दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
द हिंदू की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में क्या था:
द हिंदू (The Hindu) में 14 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने उस समय एक बयान में बताया था कि योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से राज्य में 15,000 से अधिक पुलिस मुठभेड़ हुई हैं। सरकार के अनुसार, इन कार्रवाइयों में 256 कुख्यात अपराधी मारे गए।
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों में 15,726 मुठभेड़, 31,960 अपराधियों की गिरफ्तारी और 10,324 अपराधियों के घायल होने की जानकारी दी गई थी। बयान में कहा गया था कि सरकार ने अपराध के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाई है।
मुठभेड़ों के अलावा कड़े कानूनों का इस्तेमाल:
द हिंदू की इसी खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने मुठभेड़ों के साथ-साथ संपत्ति जब्त करने, गैंगस्टर अधिनियम के तहत मामले दर्ज करने और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम यानी एनएसए जैसे कड़े कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने की कार्रवाई का भी उल्लेख किया था।
इस तरह सरकार की ओर से अपराध के खिलाफ अपनाई गई नीति में पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ कड़े कानूनी प्रावधानों के इस्तेमाल को भी प्रमुखता दी गई थी।
अब गैंगस्टर अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:
अब गैंगस्टर अधिनियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सामने आई। 22 अगस्त 2026 को अमर उजाला (Amar Ujala) में प्रकाशित खबर के अनुसार, अदालत ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों में कई कमियां होने की बात कही और इसके संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताई।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दो वकीलों के खिलाफ इस कानून के तहत दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए कानून के इस्तेमाल से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया।
केवल गैंगस्टर बताकर सजा नहीं दी जा सकती:
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को केवल ‘गैंगस्टर’ करार देकर दंडित नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, किसी व्यक्ति पर केवल एक विशेष पहचान या आरोप का लेबल लगा देना सजा का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं हो सकता।
अपराध और सजा के लिए कानून में स्पष्ट और ठोस कानूनी आधार होना जरूरी है। अदालत की टिप्पणी इसी कानूनी सिद्धांत के संदर्भ में सामने आई।
कानून को ‘स्टिलबॉर्न’ बताने की टिप्पणी:
पीठ ने इस कानून को ‘स्टिलबॉर्न’ बताया। इसका अर्थ शुरुआत से ही मृत या प्रभावहीन कानून से है। अदालत की टिप्पणी के अनुसार, यदि किसी कानून में अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित किए बिना सजा का प्रावधान किया जाता है, तो उसकी कानूनी वैधता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
अदालत ने इसी आधार पर कानून की संरचना को लेकर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि केवल किसी व्यक्ति को गैंगस्टर की श्रेणी में रखकर उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
लंबी हिरासत को लेकर भी चिंता:
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि इस अधिनियम के तहत आरोपी को लंबे समय तक मुकदमे के बिना हिरासत में रखे जाने की स्थिति पैदा हो सकती है। पीठ ने ऐसी स्थिति को एहतियाती हिरासत जैसी परिस्थिति से जोड़ते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े पहलू को महत्वपूर्ण माना।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी आपराधिक कार्रवाई में नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण होता है।
निर्दोष नागरिकों के फंसने की आशंका:
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में कानून के संभावित दुरुपयोग का पहलू भी सामने आया। अदालत ने चिंता जताई कि संगठित अपराध और हिंसा पर रोक लगाने के उद्देश्य से बनाए गए कानून का इस्तेमाल ऐसे मामलों में भी हो सकता है, जहां नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई का पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद न हो।
अदालत के अनुसार, सामाजिक खतरा कितना भी गंभीर क्यों न हो, उसके नाम पर नागरिकों के खिलाफ मनमानी कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जा सकती।
सही उद्देश्य से हर तरीका सही नहीं:
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक गिरोहों पर लगाम लगाना जरूरी है, लेकिन केवल उद्देश्य सही होने से उसे हासिल करने का हर तरीका सही नहीं हो जाता। खासकर तब, जब किसी कानून के इस्तेमाल से नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती हो।
इस टिप्पणी में कानून के उद्देश्य के साथ-साथ उसके इस्तेमाल की वैधानिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन पर जोर दिखाई देता है।
जॉर्ज ऑरवेल के विचार का उल्लेख:
पीठ ने अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) का भी हवाला दिया। अदालत ने हिंसा के संदर्भ में उनके विचार का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि जो लोग हिंसा का त्याग कर पाते हैं, उनके ऐसा करने के पीछे यह स्थिति भी हो सकती है कि दूसरे उनकी ओर से हिंसा कर रहे होते हैं।
अदालत ने इस विचार को कानून, हिंसा और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक संदर्भ में सामने रखा।
सरकारी कार्रवाई और न्यायिक सवाल एक साथ:
द हिंदू (The Hindu) की अक्टूबर 2025 की खबर में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई और मुठभेड़ों के आंकड़े सामने रखे गए थे। वहीं अमर उजाला (Amar Ujala) की हालिया खबर में उसी गैंगस्टर अधिनियम के प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणियां सामने आई हैं।
दोनों घटनाओं को एक साथ देखने पर तस्वीर का एक पक्ष सरकार की अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई का है, जबकि दूसरा पक्ष कानून के इस्तेमाल और उसकी वैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता का है। यह रिपोर्ट उपलब्ध दोनों स्रोतों में प्रकाशित तथ्यों को आधार बनाकर पूरे मामले को समझने की कोशिश है।
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