सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें यह कहा गया था कि किसी लड़की के पायजामे का नाड़ा तोड़ना और स्तनों को पकड़ना ‘रेप के प्रयास’ की श्रेणी में नहीं आता। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की हरकतें गंभीर आपराधिक कृत्य हैं और इन्हें रेप के प्रयास के रूप में देखा जाएगा। यह निर्णय उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के कासगंज (Kasganj) जिले से जुड़े एक मामले में दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में फैसला:
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Suryakant) की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को यह अहम फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी नाबालिग के साथ इस तरह की शारीरिक छेड़छाड़ की जाती है, जिसमें उसके वस्त्रों को नुकसान पहुंचाया जाए और निजी अंगों को पकड़ा जाए, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने माना कि ऐसे कृत्य कानून की दृष्टि में गंभीर हैं और दंडनीय अपराध की श्रेणी में आते हैं।
क्या है पूरा मामला:
यह प्रकरण वर्ष 2022 का है, जब कासगंज (Kasganj) जिले में एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, गांव के तीन युवकों ने उसकी नाबालिग बेटी को घर छोड़ने के बहाने रोका और उसके साथ आपत्तिजनक हरकत की। आरोप है कि बच्ची के निजी अंगों को पकड़ा गया और उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी गई। घटना के बाद पीड़िता की मां ने संबंधित थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई।
POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज:
मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। कासगंज की विशेष पॉक्सो अदालत ने वर्ष 2023 में तीनों आरोपियों को समन जारी किया। इसके बाद आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) में याचिका दाखिल कर विशेष अदालत के आदेश को चुनौती दी।
हाईकोर्ट के आदेश पर उठा विवाद:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 मार्च 2025 को अपने आदेश में कहा था कि आरोपित कृत्य रेप या रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आते, और इस आधार पर ‘अटेम्प्ट टू रेप’ की धारा हटाने का निर्देश दिया था। इस आदेश के सार्वजनिक होने के बाद विभिन्न स्तरों पर बहस और विवाद की स्थिति बनी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने स्वतः संज्ञान लिया और 25 मार्च 2025 को हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी।
सुप्रीम कोर्ट ने किया आदेश निरस्त:
सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय को पूरी तरह रद्द कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि किसी नाबालिग के साथ इस प्रकार की जबरन शारीरिक हरकत की जाती है, तो उसे ‘रेप के प्रयास’ की श्रेणी से बाहर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है और ऐसे मामलों में सख्त दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
यह निर्णय बाल संरक्षण कानूनों की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने संकेत दिया कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और विधिक प्रावधानों की गंभीरता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
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