1989: इलाहाबाद के पुराने शहर में उन दिनों शौक़ इलाही उर्फ़ चांद बाबा नाम के गैंगस्टर का ख़ौफ़ हुआ करता था. पुराने इलाहाबादी बताते हैं कि पुलिस भी चौक और रानीमंडी की तरफ़ नहीं जाती थी. उस समय तक अतीक़ 20-22 साल का हो गया था और उसे ठीक-ठाक गुंडा माना जाने लगा था. पुलिस और नेता, दोनों ही उसे शह दे रहे थे. दोनों ही चांद बाबा के ख़ौफ़ को ख़त्म करना चाहते थे. सो उन्होंने पुरानी नीति का सहारा लिया- ख़ौफ़ के बरक्स ख़ौफ़. इसी क़वायद का नतीजा था अतीक़ का उभार, जो आगे चलकर चांद बाबा से ज़्यादा पुलिस के लिए खतरनाक हो गया.

