वाराणसी (Varanasi) माघ मेले में मौनी अमावस्या के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद (Shankaracharya Avimukteshwaranand) के साथ हुए विवाद पर यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक (Brajesh Pathak) ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि चोटी खींचना महाअपराध है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
डिप्टी सीएम का कड़ा संदेश:
ब्रजेश पाठक ने कहा, “यदि पुलिसकर्मियों को बल का प्रयोग करना है तो उनके पास अन्य संसाधन मौजूद हैं। लाठी का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन चोटी खींचना बिल्कुल नहीं होना चाहिए। यह महापाप का कार्य है और हिंदू माइथोलॉजी में सबकुछ लिखा जाता है। दोषियों को भारी पाप लगेगा।” यह बयान उन्होंने टाइम्स नाउ (Times Now) कॉन्क्लेव में दिया।
सियासी और सामाजिक प्रतिक्रिया:
ब्रजेश पाठक का बयान ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी को ध्यान में रखते हुए डैमेज कंट्रोल के तौर पर भी देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी गई कि “सबके अलग-अलग विचार हैं। योगीजी के विचार अलग हैं। वह संत या आचार्य को नहीं मानते।” कुछ यूजर्स ने सवाल किया कि कार्रवाई कौन करेगा और सरकार में कौन है।
सीएम योगी आदित्यनाथ का दृष्टिकोण:
सीएम योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने विधानसभा में कहा कि हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं हो सकता और कोई कानून से ऊपर नहीं है। उन्होंने बताया कि माघ मेले में जो मुद्दा नहीं था, उसे जानबूझकर मुद्दा बनाया गया। उन्होंने कहा, “कानून सबके लिए बराबर है। मेरे लिए भी वही कानून लागू होता है जो आम व्यक्ति के लिए है।”
शंकराचार्य की प्रतिक्रिया:
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Swami Avimukteshwaranand) ने कहा कि सनातन धर्म में शंकराचार्य की पहचान किसी राजनीतिक प्रमाणपत्र से नहीं होती। उन्होंने 2015 में अखिलेश यादव के माथे पर चढ़े अहंकार की तुलना हाल की घटनाओं से की और कहा कि परंपरा के तहत उन्हें ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बनाया गया है।
मौनी अमावस्या का विवाद:
18 जनवरी को माघ मेले में शंकराचार्य की पालकी को पुलिस ने रोक दिया। शिष्य पालकी लेकर आगे बढ़ने लगे, जिससे पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का-मुक्की हुई। कई शिष्यों को हिरासत में लिया गया और पालकी को संगम से लगभग 1 किलोमीटर दूर ले जाया गया। इस घटना के बाद शंकराचार्य 28 जनवरी तक अपने शिविर के बाहर धरने पर रहे।
धार्मिक और प्रशासनिक संदेश:
शंकराचार्य ने जोर दिया कि सनातन धर्म में कोई भी संन्यासी शंकराचार्य के पद से ऊपर नहीं है। प्रशासन ने विवाद के समय कई प्रयास किए, लेकिन शंकराचार्य अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अड़े रहे।
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