पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ (Khawaja Asif) ने बुधवार को संसद में अमेरिका को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपने हित साधने के लिए पाकिस्तान का उपयोग किया और काम पूरा होने के बाद उसे नजरअंदाज कर दिया। उनके बयान ने पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। रक्षा मंत्री ने अफगानिस्तान में लड़ी गई दो जंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन संघर्षों में पाकिस्तान की भागीदारी का फैसला तत्कालीन सैन्य शासकों ने वैश्विक समर्थन पाने के उद्देश्य से किया था।
अफगान जंग और सैन्य शासन की भूमिका:
ख्वाजा आसिफ (Khawaja Asif) ने संसद में कहा कि अफगानिस्तान में सोवियत संघ के 1979 के हस्तक्षेप को अमेरिका ने अपने तरीके से प्रस्तुत किया और इसे सीधे आक्रमण के रूप में प्रचारित किया। उनके अनुसार, उस समय अफगान सरकार के निमंत्रण पर सोवियत सेना वहां पहुंची थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग कथा गढ़ी गई। उन्होंने जिया-उल-हक (Zia-ul-Haq) और परवेज मुशर्रफ (Pervez Musharraf) जैसे सैन्य शासकों का जिक्र करते हुए कहा कि इन नेताओं ने इस्लाम और मजहब के नाम पर जंग में भागीदारी की, जबकि असल उद्देश्य वैश्विक ताकतों का समर्थन हासिल करना था।
9/11 के बाद की रणनीतिक साझेदारी:
रक्षा मंत्री ने 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमेरिका के साथ पाकिस्तान की नई रणनीतिक साझेदारी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उस दौर में अमेरिका के साथ खड़े होने का निर्णय पाकिस्तान आज तक भुगत रहा है। उनके मुताबिक, तत्कालीन नीतियों ने देश को लंबे समय तक सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता की चुनौतियों में धकेल दिया।
इतिहास से सबक न लेने की स्वीकारोक्ति:
ख्वाजा आसिफ (Khawaja Asif) ने यह भी माना कि पाकिस्तान ने अपने इतिहास से पर्याप्त सीख नहीं ली। उन्होंने कहा कि देश ने कभी अमेरिका, कभी रूस और कभी ब्रिटेन की ओर झुकाव दिखाया, जिससे बाहरी प्रभाव बढ़ता गया। उनके अनुसार, 30-40 साल पहले की तुलना में आज इन देशों का प्रभाव कहीं अधिक दिखाई देता है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि अफगानिस्तान की जंगों में शामिल होना एक बड़ी भूल थी और वर्तमान में आतंकवाद की जो समस्या है, वह उन्हीं नीतिगत निर्णयों का परिणाम है।
शिक्षा प्रणाली में बदलाव का दावा:
रक्षा मंत्री ने दावा किया कि जंगों को सही ठहराने के लिए शिक्षा व्यवस्था में भी बदलाव किए गए। उन्होंने कहा कि उस समय की नीतियों के तहत पाठ्यक्रम और सोच में परिवर्तन लाए गए, जिनका असर आज भी देखा जा सकता है। उनके अनुसार, अतीत की गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सके।
बिल क्लिंटन के दौरे का संदर्भ:
ख्वाजा आसिफ (Khawaja Asif) ने वर्ष 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन (Bill Clinton) की इस्लामाबाद यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत दौरे के बाद क्लिंटन कुछ घंटों के लिए पाकिस्तान आए थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के संबंध सीमित उद्देश्य तक ही सिमट गए थे। उस समय परवेज मुशर्रफ (Pervez Musharraf) पर लोकतंत्र, परमाणु प्रसार और आतंकवाद के मुद्दों को लेकर दबाव बनाया गया था।
सैन्य शासन का दौर और राजनीतिक परिदृश्य:
अक्टूबर 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ (Pervez Musharraf) ने तख्तापलट कर नवाज शरीफ (Nawaz Sharif) की सरकार को हटा दिया था। इसके बाद देश में सैन्य शासन लागू रहा और 2002 तक कोई निर्वाचित प्रधानमंत्री नहीं था। बाद में चुनाव कराए गए, जिसके पश्चात जफरुल्लाह खान जमाली (Zafarullah Khan Jamali) प्रधानमंत्री बने। रक्षा मंत्री के बयान में इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए यह संकेत दिया गया कि उस दौर के निर्णयों का प्रभाव आज भी पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी नीतियों पर दिखाई देता है।
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