संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत के मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। मंगलवार को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने उसकी निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का खर्च भी लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को अकेले निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने NSA हिरासत की रद्द:
मुल्ला अफरोज ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से लगाए गए NSA को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। 8 सितंबर को मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। 9 सितंबर तक सरकार को अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने के लिए कहा गया था। इसके बाद 29 सितंबर को अदालत ने फैसला सुनाते हुए NSA के तहत जारी हिरासत आदेश को निरस्त कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के आधार में पुलिस हिरासत के दौरान कथित तौर पर दिए गए कबूलनामे के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया था। अदालत के अनुसार, ऐसे कथित कबूलनामे को अकेले निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता।
उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का खर्च:
अदालत ने मुल्ला अफरोज की NSA के तहत हिरासत को रद्द करने के साथ उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का खर्च लगाया। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में हिरासत आदेश को बरकरार रखा था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पलट दिया।
मुल्ला अफरोज की ओर से मामले में अधिवक्ता दिव्येश प्रताप सिंह समेत अन्य वकीलों ने पक्ष रखा। सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित किए जाने के दौरान सरकार को अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का अवसर दिया गया था।
सरकार ने हिंसा दोबारा भड़कने की आशंका जताई थी:
मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत का बचाव किया गया था। सरकार की दलील थी कि उसकी रिहाई से क्षेत्र में दोबारा हिंसा भड़कने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी। इसी आधार पर निवारक हिरासत को जरूरी बताया गया था।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के आधार के तौर पर इस्तेमाल किए गए कथित पुलिस हिरासत वाले कबूलनामे की कानूनी स्थिति पर सवाल उठाया। अदालत ने इसी पहलू पर सुनवाई के दौरान सरकार से जवाब मांगा था।
संभल हिंसा के बाद गिरफ्तार हुआ था मुल्ला अफरोज:
संभल में नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी। कोर्ट के आदेश पर सर्वे के दौरान बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे। इसके बाद पथराव और गोलीबारी की घटना हुई। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए थे।
हिंसा के मामले में पुलिस ने कई मुकदमे दर्ज किए और बड़ी संख्या में लोगों को आरोपी बनाया। मुल्ला अफरोज को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद अक्टूबर 2025 में उसके खिलाफ NSA के तहत निवारक हिरासत की कार्रवाई की गई थी।
NSA के तहत हिरासत को दी गई थी चुनौती:
मुल्ला अफरोज की ओर से दायर याचिका में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से की गई निवारक हिरासत की कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले इस हिरासत को बरकरार रखा था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सितंबर 2026 में इस पर सुनवाई हुई।
8 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था। अदालत ने विशेष रूप से यह सवाल उठाया था कि पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए कबूलनामे के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निवारक हिरासत का आदेश किस हद तक कायम रह सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निवारक हिरासत पर सवाल:
मंगलवार के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की NSA के तहत हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने कथित पुलिस हिरासत वाले कबूलनामे को अकेले हिरासत का आधार मानने से इनकार किया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का खर्च लगाया। हालांकि, यह आदेश NSA के तहत हिरासत के संबंध में है; इससे मुल्ला अफरोज के खिलाफ दर्ज अन्य आपराधिक मामलों का स्वतः निस्तारण नहीं होता।
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