गुजरात (Gujarat) के अहमदाबाद (Ahmedabad) में रहने वाला 26 वर्षीय जावेद पिछले 18 वर्षों से एक दुर्लभ जेनेटिक बीमारी से संघर्ष कर रहा है। कभी स्कूल में दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने वाला जावेद आज ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है कि वह बिना किसी सहारे के बिस्तर से भी नहीं उठ पाता। उसके घुटने, कोहनी, कलाई और कूल्हों के जोड़ धीरे-धीरे सख्त हो चुके हैं। हालत यह है कि शरीर की मामूली हरकत भी उसके लिए असहनीय दर्द का कारण बन जाती है और रोजमर्रा के लगभग सभी कामों के लिए उसे अपने माता-पिता की सहायता लेनी पड़ती है।
बचपन में नहीं दिखे बीमारी के संकेत:
परिवार के अनुसार जावेद का शुरुआती बचपन सामान्य बच्चों की तरह ही बीता। हालांकि कुछ समय बाद उसकी लंबाई बढ़ना रुक गई और शरीर लगातार कमजोर होने लगा। शुरुआत में इसे सामान्य शारीरिक समस्या मानकर इलाज कराया गया, लेकिन समय के साथ उसकी स्थिति में सुधार होने के बजाय लगातार गिरावट आती रही। कई अस्पतालों में जांच और इलाज के बाद डॉक्टरों ने जेनेटिक टेस्ट कराने की सलाह दी। जांच रिपोर्ट में सामने आया कि जावेद मार्कियो सिंड्रोम (Morquio Syndrome) यानी म्यूकोपॉलीसैकराइडोसिस टाइप-4 (Mucopolysaccharidosis Type-IV) नाम की दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित है।
क्या है मार्कियो सिंड्रोम:
विशेषज्ञों के मुताबिक इस बीमारी में शरीर में आवश्यक एंजाइम की कमी हो जाती है। इसके कारण कुछ तत्व शरीर के जोड़ों और हड्डियों में जमा होने लगते हैं। धीरे-धीरे हड्डियां टेढ़ी होने लगती हैं और शरीर के जोड़ सख्त होते चले जाते हैं। इसका असर मरीज की चलने-फिरने की क्षमता पर पड़ता है और समय बीतने के साथ स्थिति और गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बीमारी का प्रभाव आंखों, हृदय और फेफड़ों पर भी देखने को मिल सकता है।
करीबी रिश्तों में शादी और बढ़ सकता है जोखिम:
डॉक्टरों का कहना है कि करीबी रिश्तों में विवाह होने पर कुछ आनुवंशिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे मामलों में शादी से पहले जेनेटिक काउंसलिंग और आवश्यकता पड़ने पर जेनेटिक जांच कराना भविष्य में संभावित जोखिम को कम करने में सहायक हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते सही सलाह और जांच कई मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इलाज बेहद महंगा, परिवार के लिए बड़ी चुनौती:
जावेद के परिवार का कहना है कि बीमारी की जांच और इलाज में अब तक लाखों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। डॉक्टरों ने एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी की सलाह दी है, लेकिन इस उपचार का खर्च हर साल लगभग 3 से 4 करोड़ रुपये बताया गया है। इतनी बड़ी राशि का इंतजाम कर पाना परिवार के लिए संभव नहीं है। इसी वजह से इलाज की राह आर्थिक रूप से बेहद कठिन बनी हुई है।
बहन में भी मिली वही बीमारी:
परिवार की चिंता इसलिए और बढ़ गई क्योंकि जांच के दौरान जावेद की बहन में भी इसी बीमारी की पुष्टि हुई। इससे पूरे परिवार की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। अब परिवार इलाज, आर्थिक बोझ और भविष्य की अनिश्चितताओं के बीच लगातार संघर्ष कर रहा है।
समय पर पहचान ही सबसे बड़ी उम्मीद:
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। हालांकि समय पर बीमारी की पहचान, उचित इलाज और जेनेटिक काउंसलिंग के माध्यम से मरीज की स्थिति को बेहतर बनाए रखने का प्रयास किया जा सकता है। इसके बावजूद यह दुर्लभ बीमारी आज भी कई परिवारों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है।
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Edit By : एषना शर्मा
