लखनऊ (Lucknow) में इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ पीठ ने प्रदेश के बंदियों की सजामाफी से जुड़े मामले में अहम निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने ऐसे बंदियों का पूरा ब्योरा पेश करने को कहा है, जिन्होंने जेल में 14 वर्ष की अवधि पूरी कर ली है। यह निर्देश न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिया गया है, ताकि सजामाफी से संबंधित मामलों में स्थिति स्पष्ट हो सके।
14 वर्ष पूरे कर चुके बंदियों का ब्योरा तलब:
लखनऊ पीठ ने अपर मुख्य सचिव, गृह को निर्देशित किया है कि वे निजी हलफनामे के माध्यम से उन सभी बंदियों की जानकारी दाखिल करें, जिन्होंने जेल में 14 साल की सजा पूरी कर ली है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह ब्योरा समयबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया जाए, ताकि मामले की सुनवाई प्रभावी रूप से आगे बढ़ सके।
सजामाफी मामलों की संख्या पर मांगी जानकारी:
कोर्ट ने यह भी जानना चाहा है कि बंदियों की सजामाफी पर विचार करने के लिए अब तक कितनी अर्जियां या मामले सरकार के समक्ष अग्रसारित किए गए हैं। इसके साथ ही यह विवरण भी मांगा गया है कि इनमें से कितने मामलों में सजामाफी को मंजूरी दी गई है। कोर्ट का मानना है कि इस जानकारी से यह स्पष्ट होगा कि सजामाफी से जुड़े प्रावधानों का वास्तविक क्रियान्वयन किस स्तर पर हो रहा है।
कानूनी प्रक्रिया पर उठे सवाल:
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि कानूनों के तहत बंदियों की सजा में छूट देने की जो प्रक्रिया निर्धारित है, उसे लागू करने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने यह जानने की कोशिश की कि क्या इस प्रक्रिया की नियमित निगरानी की जा रही है या नहीं। इस सवाल के जरिए कोर्ट ने सरकार की भूमिका और जिम्मेदारी को रेखांकित किया है।
निगरानी व्यवस्था पर फोकस:
लखनऊ पीठ ने यह भी पूछा कि सजामाफी से संबंधित मामलों की समीक्षा के लिए कोई नियमित व्यवस्था है या नहीं। कोर्ट का संकेत था कि यदि कानून में सजा में छूट का प्रावधान है, तो उसका लाभ पात्र बंदियों तक समय पर पहुंचना चाहिए। निगरानी की कमी के कारण यदि कोई पात्र बंदी लाभ से वंचित रह जाता है, तो यह गंभीर विषय हो सकता है।
सरकार से जवाब की अपेक्षा:
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार को सजामाफी से जुड़े मामलों में अपनाई जा रही प्रक्रिया पर स्पष्ट रुख अपनाना होगा। निजी हलफनामे के जरिए दिए जाने वाले जवाब से यह सामने आएगा कि प्रशासनिक स्तर पर इस विषय को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है। कोर्ट का यह निर्देश राज्य में बंदियों के अधिकारों और कानून के पालन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता का संदेश:
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इससे न केवल सजामाफी से जुड़े मामलों की स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि भविष्य में ऐसी प्रक्रियाओं की नियमित निगरानी का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है।
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