कोलकाता-11 जिसका, बंगाल की सत्ता की चाबी उसी के हाथ

पश्चिम बंगाल (West Bengal) की राजनीति में कोलकाता (Kolkata) हमेशा से केंद्र में रहा है। ऐतिहासिक और वैचारिक रूप से मजबूत इस शहर ने राज्य की सत्ता की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई है। आजादी के बाद से लेकर वर्तमान तक, यहां की राजनीतिक गतिविधियों ने पूरे राज्य के माहौल को प्रभावित किया है। डॉ. Rajendra Prasad (राजेंद्र प्रसाद) का जुड़ाव हो या Syama Prasad Mukherjee (श्यामा प्रसाद मुखर्जी) की विरासत, कोलकाता की पहचान एक राजनीतिक धुरी के रूप में बनी रही है। बदलते राष्ट्रीय परिदृश्य के बीच अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या पश्चिम बंगाल में भी कोई बड़ा राजनीतिक परिवर्तन देखने को मिलेगा।

जमीनी नब्ज: कांटे की टक्कर:
कोलकाता की सड़कों और गलियों में इस बार चुनावी माहौल बेहद सक्रिय नजर आ रहा है। दमदम हवाई अड्डे से लेकर शहर के अंदरूनी हिस्सों तक हर जगह राजनीतिक चर्चा तेज है। आम लोगों के बीच यह धारणा बन रही है कि मुकाबला इस बार बेहद करीबी हो सकता है। एक स्थानीय टैक्सी चालक ने बताया कि एक ओर भाजपा (BJP) ने अपनी पकड़ मजबूत की है, तो दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस (TMC) भी पूरी मजबूती के साथ मैदान में डटी हुई है। युवा, बुजुर्ग और महिलाएं—सभी वर्ग इस बार चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेते दिख रहे हैं।

संस्कृति के रंग में चुनावी असर:
बंगाली नववर्ष ‘पोइला बोइशाख’ के दौरान कोलकाता में सांस्कृतिक उत्सव का माहौल देखने को मिला। पारंपरिक परिधान में बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतरीं और विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुईं। इन आयोजनों के बीच राजनीतिक दलों की सक्रियता ने यह संकेत दिया कि चुनावी माहौल पूरी तरह चरम पर है। सांस्कृतिक आयोजनों के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

आक्रोश और जनभावना:
हाल के घटनाक्रम, विशेष रूप से RG Kar Medical College (आरजी कर मेडिकल कॉलेज) से जुड़े मामलों ने लोगों में आक्रोश पैदा किया है। आम जनता, खासकर शिक्षित महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर विरोध जताया। यह विरोध केवल किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक असंतोष को दर्शाता है। भ्रष्टाचार और विकास की गति जैसे मुद्दे अब जनचर्चा के केंद्र में हैं। शहरी बस्तियों से लेकर New Town (न्यू टाउन) और Salt Lake (साल्ट लेक) जैसे विकसित क्षेत्रों तक बदलाव की मांग सुनाई दे रही है।

आंकड़ों का गणित और सियासी समीकरण:
कोलकाता की 11 विधानसभा सीटें इस बार सत्ता की दिशा तय करने में निर्णायक मानी जा रही हैं। भाजपा ने पिछले चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत की है। वर्ष 2016 में जहां उसे केवल 3 सीटें मिली थीं, वहीं 2021 में यह संख्या बढ़कर 7 तक पहुंच गई। हालांकि बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि उसका वोट प्रतिशत अभी भी मजबूत स्थिति में है, जो उसे बढ़त दिला सकता है।

सीट-दर-सीट मुकाबले की तस्वीर:
लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार, कोलकाता उत्तर क्षेत्र की कुछ सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। Jorasanko (जोरासांको), Shyampukur (श्यामपुकुर) और Kashipur-Belgachia (काशीपुर-बेलगाछिया) जैसी सीटों पर वोटों का अंतर कम रहा है, जिससे यहां सियासी समीकरण बदलने की संभावना बनी हुई है। वहीं दक्षिण कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है। Bhabanipur (भवानीपुर) जैसी महत्वपूर्ण सीट पर विपक्ष के लिए चुनौती बड़ी बनी हुई है।

निष्कर्ष: सत्ता की चाबी कोलकाता के पास:
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। राज्य की 294 सीटों में से कोलकाता की 11 सीटें सत्ता का रास्ता तय करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर में दोनों ही दल अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। Mamata Banerjee (ममता बनर्जी) के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस यदि इन सीटों पर अपनी पकड़ बनाए रखती है, तो उसकी सत्ता में वापसी का रास्ता मजबूत होगा। वहीं भाजपा यदि यहां बड़ा प्रदर्शन करती है, तो राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है। साफ है कि “कोलकाता-11” जिस दल के पक्ष में जाएगा, वही बंगाल की सत्ता की चाबी अपने हाथ में लेगा।

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By Abhinendra

Journalist

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