KGMU मजार मामले में मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली का बयान

लखनऊ (Lucknow) स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (King George’s Medical University–KGMU) से जुड़े एक मामले को लेकर शहर में चर्चा तेज हो गई है। केजीएमयू परिसर के अंदर मौजूद एक मजार को हटाने संबंधी जारी किए गए नोटिस पर आपत्ति जताई गई है। इस नोटिस को लेकर धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर बहस शुरू हो गई है। इसी क्रम में मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली (Maulana Khalid Rashid Firangi Mahali) ने इस पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए नोटिस को गलत बताया है और इसे वापस लेने की मांग की है।

नोटिस को बताया तथ्यहीन:
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली का कहना है कि केजीएमयू की ओर से जो नोटिस जारी किया गया है, उसमें यह कहा गया है कि मजार बनाने के लिए किसी प्रकार की अनुमति नहीं ली गई थी। उन्होंने इस दावे को पूरी तरह गलत करार दिया है। उनके अनुसार जब मजार का निर्माण हुआ था, उस समय न तो केजीएमयू का अस्तित्व था और न ही लखनऊ (Lucknow) में कोई ऐसा विभाग मौजूद था, जहां से इस तरह की अनुमति ली जा सके। ऐसे में सैकड़ों साल पहले बनी मजार पर आज के नियम लागू करना तर्कसंगत नहीं है।

इतिहास और समय का संदर्भ:
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि जिस मजार को हटाने की बात कही जा रही है, वह केजीएमयू के बनने से बहुत पहले से मौजूद है। मजार की स्थापना उस दौर में हुई थी, जब आधुनिक प्रशासनिक ढांचा और विभागीय अनुमतियों की व्यवस्था नहीं थी। बाद में केजीएमयू की स्थापना हुई और उसके आसपास का क्षेत्र विकसित हुआ। ऐसे में यह कहना कि मजार बिना अनुमति बनाई गई थी, ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी है।

मजार हटाने की मांग पर आपत्ति:
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस आधार पर मजार को हटाने की बात कहना उचित नहीं है। मजार को हटाने का नोटिस न केवल गलत तथ्यों पर आधारित है, बल्कि इससे सामाजिक सौहार्द भी प्रभावित हो सकता है। उनका कहना है कि इस तरह के फैसले लेने से पहले प्रशासन को ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को गंभीरता से समझना चाहिए।

गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण:
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने लखनऊ (Lucknow) की गंगा-जमुनी तहजीब का उल्लेख करते हुए कहा कि यह शहर हमेशा से आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता के लिए जाना जाता रहा है। मजार पर बड़ी संख्या में मुसलमानों के साथ-साथ गैर-मुस्लिम भी आते हैं। यह स्थान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। ऐसे स्थलों पर किसी भी तरह की कार्रवाई से पहले सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।

सामाजिक सौहार्द पर असर:
उन्होंने कहा कि मजार हटाने जैसे कदम से समाज में गलत संदेश जा सकता है। इससे लोगों की भावनाएं आहत हो सकती हैं और आपसी विश्वास पर असर पड़ सकता है। उनका मानना है कि इस तरह के मुद्दों को बातचीत और आपसी समझ के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, न कि एकतरफा नोटिस जारी करके।

नोटिस वापस लेने की मांग:
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने प्रशासन से अपील की है कि केजीएमयू द्वारा जारी किए गए नोटिस को तत्काल वापस लिया जाए। साथ ही मजार को हटाने की जो बात कही गई है, उस पर रोक लगाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह कदम न केवल ऐतिहासिक अन्याय को रोकेगा, बल्कि शहर की सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत करेगा।

कानूनी और सामाजिक संतुलन की जरूरत:
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी निर्णय में भारतीय कानून और सामाजिक संतुलन दोनों को साथ लेकर चलना जरूरी है। धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और निष्पक्षता बेहद अहम है। प्रशासन को चाहिए कि वह सभी पक्षों को सुने और तथ्यों के आधार पर ही कोई कदम उठाए।

शहर में बढ़ी चर्चा:
इस बयान के बाद केजीएमयू (KGMU) मजार नोटिस का मामला शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग इस मुद्दे को लखनऊ (Lucknow) की साझा विरासत और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले समय में प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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