गाजीपुर: फिटनेस जांच के बाद भी सड़क पर दौड़ रहे स्कूली वाहन, बच्चों की सुरक्षा पर सवाल

गाजीपुर में बच्चों की सुरक्षा को लेकर परिवहन विभाग की ओर से चलाए गए अभियान के बावजूद स्कूली वाहनों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। Operation Safe Future (ऑपरेशन सेफ फ्यूचर) के तहत जुलाई और अगस्त में स्कूली वाहनों की जांच कर कार्रवाई की गई। कई वाहनों को सीज किया गया और दर्जनों के चालान भी काटे गए। इसके बावजूद अब सवाल इस बात पर है कि कार्रवाई के बाद इन वाहनों की निगरानी किस तरह हो रही है।

अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय इस भरोसे के साथ वाहन में बैठाते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित तरीके से स्कूल पहुंचेगा। ऐसे में यदि कोई वाहन फिटनेस जांच में मानकों पर खरा नहीं उतरता और इसके बावजूद बच्चों को लाने-ले जाने के लिए सड़क पर दिखाई देता है, तो यह बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।

जुलाई में हुई थी कार्रवाई:

गाजीपुर में जुलाई के दौरान स्कूली वाहनों की जांच के लिए अभियान चलाया गया था। इस दौरान स्कूल बसों को सीज करने के साथ कई वाहनों के चालान भी किए गए। कार्रवाई का उद्देश्य स्कूली वाहनों की स्थिति और सुरक्षा मानकों की जांच करना था।

कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिन वाहनों को जांच के दौरान नियमों के अनुरूप नहीं पाया गया, उनकी आगे निगरानी किस स्तर पर की जा रही है। केवल जांच और कार्रवाई तक सीमित रहने के बजाय यह भी महत्वपूर्ण है कि कार्रवाई के बाद ऐसे वाहन दोबारा बच्चों को लेकर सड़कों पर न दिखाई दें।

अगस्त में भी सामने आई बड़ी कार्रवाई:

अगस्त में भी स्कूली वाहनों की जांच की गई। दी गई जानकारी के अनुसार एक स्कूल के करीब 16 वाहनों पर कुल 3 लाख 13 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। इसी कार्रवाई के दौरान 25 साल पुरानी एक बस को भी सीज किया गया।

इस कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि स्कूली वाहनों की जांच के दौरान नियमों से जुड़े गंभीर मामले सामने आए थे। ऐसे में बच्चों को स्कूल लाने और ले जाने वाले वाहनों की स्थिति को लेकर लगातार निगरानी की आवश्यकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कार्रवाई के बाद निगरानी पर सवाल:

स्कूली वाहनों की जांच और उनके खिलाफ कार्रवाई को लेकर अब सवाल कार्रवाई से आगे बढ़कर निगरानी पर केंद्रित हो गया है। यदि कोई वाहन फिटनेस जांच में अनफिट पाया जाता है या सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करता, तो उसके दोबारा सड़क पर संचालन को लेकर प्रभावी निगरानी जरूरी मानी जाती है।

बच्चों को लेकर चलने वाले वाहनों के मामले में अभिभावकों की चिंता भी इसी मुद्दे से जुड़ी है। उनका भरोसा इस बात पर टिका होता है कि जिस वाहन से उनका बच्चा स्कूल जा रहा है, वह सुरक्षित और निर्धारित मानकों के अनुरूप है।

अनफिट वाहनों को लेकर बड़ा सवाल:

सबसे अहम सवाल यह है कि यदि कोई वाहन फिटनेस जांच में अनफिट पाया जाता है, तो उसके बाद उसकी स्थिति की निगरानी किस तरह की जाती है। क्या ऐसे वाहनों की दोबारा जांच सुनिश्चित होती है और क्या यह देखा जाता है कि वे बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने के लिए दोबारा सड़क पर तो नहीं उतर रहे हैं।

इसी के साथ यह सवाल भी सामने आता है कि यदि किसी वाहन की उम्र निर्धारित सीमा से अधिक है या वह सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करता, तो बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसके संचालन पर किस स्तर तक रोक सुनिश्चित की जाती है।

अभिभावकों की नजर परिवहन विभाग पर:

गाजीपुर में स्कूली वाहनों की जांच और कार्रवाई के बाद अब अभिभावकों की नजर परिवहन विभाग की आगे की निगरानी पर है। सवाल यह है कि क्या सड़क पर चल रहे सभी स्कूली वाहनों की दोबारा जांच की जाएगी और अनफिट पाए गए वाहनों के संचालन को रोका जाएगा।

बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा मामला होने के कारण केवल अभियान चलाना ही पर्याप्त है या कार्रवाई के बाद भी लगातार निगरानी की व्यवस्था जरूरी है, यह सवाल अब चर्चा के केंद्र में है। अभिभावक यह जानना चाहते हैं कि बच्चों को स्कूल ले जाने वाले वाहनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।

फिलहाल गाजीपुर में स्कूली वाहनों पर हुई कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि बच्चों की सुरक्षा में किसी भी संभावित लापरवाही की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी और अनफिट वाहनों को दोबारा सड़क पर आने से रोकने के लिए निगरानी कितनी प्रभावी होगी।

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रिपोर्ट : सऊद अंसारी
ब्यूरो: हसीन अंसारी

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