एक बार फिर विवाद से घिरा गाज़ीपुर मेडिकल कॉलेज…

Ghazipur Medical College Exposed? गाज़ीपुर मेडिकल कॉलेज में ये कैसा खेल?

“मैं अपने कुत्ते की हड्डी टूट जाए तो भी ये प्लास्टर नहीं करूँगा” ये कथन है गाज़ीपुर मेडिकल कॉलेज में तैनात डॉक्टर साहब का। ये विडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, डॉक्टर साहब कथन सुनकर यही प्रतीत होता है कि ये बेतुका बयानबाजी है। विडियो में जब डॉक्टर साहब ऐसा बोलते हैं तो मरीज के परिजन नाराज हो जाते हैं, उनका सवाल था कि आखिर मेरी बच्ची की तुलना कुत्ते से क्यों की। फिर क्या था डॉक्टर साहब भी भड़क जाते हैं और मरीज के परिजनों को बकैती निकालने की धमकी देने लगते हैं। डॉक्टर के इस बयान पर गाजीपुर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल का रिएक्शन भी सामने आया है उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो पर जांच की जा रही है।

अब इसे मामले को समझते हैं, दरअसल बताया जा रहा है कि ये पूरा मामला उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर में स्थित महर्षि विश्वामित्र स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय है जिसे गाजीपुर मेडिकल कॉलेज भी कहा जाता है। इस वायरल विडियो में कॉलेज के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. वैभव सिंह नज़र आ रहे हैं, एक बालिका के पैर में चोट लगी है और उसे प्लास्टर लगाया गया है और प्लास्टर की क्वालिटी को लेकर बहस शुरू होती है। परिजन पहले बालिका को लेकर मेडिकल कॉलेज आये थे, प्लास्टर लगा था लेकिन दर्द बढ़ता गया तो मंगलवार को दुबारा वो मेडिकल कॉलेज आये, जिस दिन का ये विडियो बताया जा रहा है।

यदि आप इस वायरल विडियो को ध्यान से समझने की कोशिश करें तो डॉक्टर का स्पष्ट रूप से कहना है कि जो सामान मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध है हम उसका इस्तेमाल कर रहे हैं और उस सामान से यही रिजल्ट आएगा, यदि प्लास्टर ख़राब होता है तो हम पुन: लगायेंगें। इस बात को लेकर मरीज के परिजन की नाराजगी देखी जा सकती है, उनका कहना है कि क्या गरीब लोगों के लिए यही व्यवस्था है तो डॉक्टर कहते हैं कि यहाँ पर यही और यही दिया गया जिसका इस्तेमाल हम कर रहे हैं, प्रिंसिपल साहब ने कहा है कि बाहर से सामान नहीं लाना है, अच्छे गुणवत्ता का प्लास्टर बाहर मिलता है, वो पैसे वालों के लिए है और ये गरीबों के लिए।

अब यहाँ पर एक बात समझ नहीं आती की डॉक्टर व्यंग के माध्यम से व्यवस्था की सच्चाई बता रहे हैं या कुछ और? लेकिन मरीज के परिजन की नाराजगी कम नहीं होती, हल्की आवाज में शुरू हुई ये बहस तेज आवाज में बदल जाती है, डॉक्टर को भी गुस्सा आता है और व्यवस्थाओं की कमी को उजागर करते हुए वो भाषा की मर्यादा भूल जाते हैं और कहते हैं कि ये प्लास्टर मैं अपने कुत्ते को भी ना लगाऊ।

यानी क्या वाकई इस प्लास्टर की गुणवत्ता इतनी ख़राब है कि डॉक्टर साहब कुत्ते को भी नहीं लगायेंगें, ये काम नहीं करेगा? बड़ा सवाल तो यही है, लेकिन बहस में मुद्दे गायब हो जाते हैं जज्बात जाग जाते हैं। मरीज के परिजन ने सवाल सही उठाया कि आखिर क्यों इतनी ख़राब व्यवस्था रखी गयी है? लेकिन ये बहस कुत्ते तक पहुंची और बात बिगड़ गयी।

मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर आनंद मिश्रा के रिएक्शन पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि आखिर वो कहना क्या चाहते हैं?

इतना गंभीर मुद्दा है और बड़े सवाल हैं, अब तो स्थानीय जनता को ही सच ढूँढना होगा और वाकई में यदि मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था ख़राब है तो आप हमें हमारे ईमेल आईडी apnabharattimes@gmail.com पर उस सम्बंधित जानकारी, फोटो या विडियो साझा कर सकतें लेकिन भारतीय संविधान और कानून का पालन करते हुए। कभी भी किसी समस्या के समाधान के लिए हिंसा का सहारा न लें, समझदारी से सवाल को बार बार पूछने से जवाब आये या ना आये लेकिन सच सामने आ ही जाता है।

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