Ghazipur (गाजीपुर) के Bahariyabad (बहरियाबाद) थाना क्षेत्र में वर्ष 2004 में हुए चर्चित दोहरे हत्याकांड मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे महेंद्र यादव उर्फ मुन्ना को राहत नहीं मिली है। राज्यपाल Anandiben Patel (आनंदीबेन पटेल) ने उसकी दया याचिका खारिज कर दी है। आदेश के बाद अब दोषी को आजीवन कारावास की सजा जेल में ही पूरी करनी होगी।
यह मामला वर्ष 2004 में ग्राम प्रधानी चुनाव की रंजिश से जुड़ा था, जिसमें लेखपाल श्यामदेव यादव और देवकीनंदन यादव उर्फ रामानंद की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने उस समय पूरे इलाके में सनसनी फैला दी थी।
राज्यपाल ने दया याचिका की खारिज:
जिला प्रोबेशन अधिकारी Sanjay Soni (संजय सोनी) ने जानकारी देते हुए बताया कि शासन के उप सचिव Kamlesh Kumar (कमलेश कुमार) की ओर से 7 अप्रैल 2026 को जिला प्रशासन को पत्र भेजा गया था। इस पत्र में राज्यपाल द्वारा दया याचिका खारिज किए जाने की जानकारी दी गई।
पत्र के अनुसार 50 वर्षीय महेंद्र यादव उर्फ मुन्ना अब तक 14 वर्ष 8 माह की सजा काट चुका है। हालांकि दया याचिका समिति ने माना कि दो लोगों की हत्या के दोषी को रिहा करना समाज में गलत संदेश देगा।
जेल में रहने से क्षेत्र में बनी शांति:
दया याचिका पर Ghazipur (गाजीपुर) के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने भी आपत्ति दर्ज कराई थी। दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि दोषी का अपराध किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ा था।
अधिकारियों का यह भी कहना था कि महेंद्र यादव के जेल में रहने की वजह से इलाके में शांति व्यवस्था बनी हुई है। साथ ही परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी रिहाई के अनुकूल नहीं माना गया।
ग्राम प्रधानी चुनाव की रंजिश में हुई थी हत्या:
जानकारी के अनुसार 17 सितंबर 2004 को ग्राम प्रधानी चुनाव की रंजिश को लेकर यह वारदात हुई थी। आरोप था कि महेंद्र यादव उर्फ मुन्ना ने अपने साथियों शिवपूजन यादव, राजेश यादव, सुरेश यादव और त्रिलोकी राजभर के साथ मिलकर लेखपाल श्यामदेव यादव और देवकीनंदन यादव उर्फ रामानंद की गोली मारकर हत्या कर दी थी।
घटना के बाद इलाके में काफी तनाव का माहौल बन गया था और पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया था।
अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा:
Ghazipur (गाजीपुर) की अदालत ने 30 अप्रैल 2011 को मामले की सुनवाई के बाद महेंद्र यादव, शिवपूजन यादव, राजेश यादव और त्रिलोकी राजभर को फांसी की सजा सुनाई थी। वहीं सुरेश यादव को आजीवन कारावास की सजा दी गई थी।
बाद में 14 अगस्त 2013 को Allahabad High Court (इलाहाबाद हाईकोर्ट) ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। इसके बाद से दोषी जेल में सजा काट रहा है।
प्रशासन को भेजी गई आदेश की प्रति:
राज्यपाल के आदेश की प्रति कारागार महानिदेशक और Varanasi Central Jail (वाराणसी केंद्रीय कारागार) के वरिष्ठ अधीक्षक को भी भेज दी गई है। प्रशासनिक स्तर पर आगे की प्रक्रिया पूरी की जा रही है।
इस फैसले के बाद एक बार फिर यह मामला चर्चा में आ गया है। स्थानीय स्तर पर इसे कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले के रूप में देखा जा रहा है।
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रिपोर्ट : सऊद अंसारी
ब्यूरो: हसीन अंसारी
