गाजीपुर में अनोखा सरेंडर, चारपाई पर लेटकर कोर्ट पहुंचा 70 साल का बुजुर्ग; आखिर किस मामले में दोषी?

रिपोर्टर: हसीन अंसारी

गाजीपुर में न्यायालय परिसर उस समय चर्चा का विषय बन गया, जब एक आरोपी चारपाई पर लेटकर अदालत में सरेंडर करने पहुंचा। चेक बाउंस के मामले में पूर्व में सुनाई गई सजा के अनुपालन में वह एसीजेएम कोर्ट में उपस्थित हुआ। अदालत ने पहले से निर्धारित आदेश के अनुसार आरोपी को तीन माह की सजा सुनाते हुए जेल भेजने का निर्देश दिया।

कोर्ट परिसर में दिखा अनोखा दृश्य:
गाजीपुर (Ghazipur [Uttar Pradesh]) न्यायालय परिसर में उस वक्त लोग हैरान रह गए, जब एक व्यक्ति चारपाई पर लेटा हुआ अदालत में दाखिल हुआ। मामला एसीजेएम कोर्ट (ACJM Court [Ghazipur]) से जुड़ा है, जहां आरोपी ने आत्मसमर्पण किया। न्यायालय की कार्यवाही के दौरान यह दृश्य चर्चा का विषय बना रहा।

चेक बाउंस से जुड़ा है मामला:
जानकारी के अनुसार आरोपी रामदरश यादव ने अजीत राम से व्यापार के सिलसिले में लगभग नौ लाख रुपये उधार लिए थे। ऋण चुकाने के लिए दिए गए चेक के बाउंस हो जाने के बाद विवाद उत्पन्न हुआ। आरोप है कि निर्धारित समय पर ऋण की अदायगी नहीं की गई, जिसके बाद वादी ने न्यायालय का रुख किया। सुनवाई के बाद एसीजेएम कोर्ट ने आरोपी को तीन माह की सजा तथा ब्याज सहित धनराशि लौटाने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरेंडर:
न्यायालय के फैसले के विरुद्ध आरोपी ने उच्च न्यायालय में अपील की थी। बताया गया कि उच्च न्यायालय से निर्देश मिला कि वह निचली अदालत में आत्मसमर्पण करे। इसी क्रम में आरोपी गाजीपुर की एसीजेएम कोर्ट में पेश हुआ। हालांकि, वह चारपाई पर लेटकर पहुंचा और स्वयं को अस्वस्थ तथा पैरालाइज्ड बता रहा था।

वकीलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप:
वादी पक्ष के अधिवक्ता का कहना है कि आरोपी सजा और ऋण भुगतान से बचने के उद्देश्य से बीमारी का हवाला दे रहा है। दूसरी ओर, आरोपी की ओर से स्वास्थ्य संबंधी दावे किए गए। न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों और पूर्व आदेश के आधार पर तीन माह की सजा लागू करने का निर्देश दिया। इसके बाद आरोपी को जेल भेजने की प्रक्रिया पूरी की गई।

अदालत का आदेश और आगे की प्रक्रिया:
एसीजेएम कोर्ट ने पूर्व में सुनाए गए फैसले को प्रभावी करते हुए आरोपी को न्यायिक अभिरक्षा में भेजने का आदेश दिया। बताया जा रहा है कि आरोपी की उम्र 70 वर्ष से अधिक है। फिलहाल न्यायालय के आदेश के अनुसार उसे जेल भेज दिया गया है। कानून के तहत जब तक किसी उच्चतर न्यायालय से राहत नहीं मिलती, तब तक निचली अदालत का आदेश प्रभावी रहता है।

मामला न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत है और संबंधित पक्षों को विधिक प्रावधानों के तहत अपना पक्ष रखने का अधिकार है। अदालत के अंतिम आदेशों के अनुसार ही आगे की कार्रवाई निर्धारित होगी।

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