क्या युवा समझ पायेंगें चुनावी चंदे का फंडा?

ख़बरों का दावा है कि उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा युवा मतदाताओं वाला जनपद गाजीपुर है और यहाँ दो लोकसभा है. 29 लाख 27 हजार 678 मतदाताओं को वोट करने का मौका मिलेगा, इनमें 15 लाख 44 हजार 879 मतदाता पुरुष, 13 लाख 82 हजार 714 महिला मतदाता और 85 थर्ड जेंडर मतदाता हैं। इसमें 18-19 आयु वर्ग के 60 हजार 658 मतदाता हैं, जिसमें 32 हजार 651 पुरुष और 28 हजार 05 महिला और 2 थर्ड जेंडर मतदाता हैं।
7 विधानसभाओं वाले जनपद का एक बड़ा हिस्सा गाजीपुर लोकसभा में है और करीब दो विधानसभाओं का हिस्सा बलिया लोकसभा में है, लेकिन दोनों ही लोकसभा में भाजपा ने प्रत्यासियों की घोषणा नहीं की है. हो सकता है मेरे इस खबर के बाद प्रत्यासियों का नाम सामने आ जाये. लेकिन सवाल केवल उम्मीदवार को लेकर नहीं है. सवाल तो मुद्दों का है युवाओं के मुद्दों का.

  • क्या युवा अपने धर्म को समझते हैं?
  • क्या युवा शिक्षा का महत्त्व समझते हैं?
  • क्या युवा रोजगार की परिभाषा समझते हैं?
  • क्या युवा विकास की परिभाषा समझते हैं?
  • क्या युवा समाज की परिभाषा समझते हैं?

इन सबको समझने के लिए आपको ये समझना होगा कि सरकार के पास पैसे कहाँ से आते हैं ये सारे काम को करने के लिए? तो समझ लीजिये कि ये पैसे आपके टैक्स से आते हैं. अरे केवल इनकम टैक्स से नहीं. इनकम टैक्स से तो आते ही हैं उसके बाद आप तेल साबुन शैम्पू इत्यादि जो भी समान खरीदते हैं उस पर भी टैक्स देते हैं. जब टैक्स के पैसे से राजस्व ठीक है तो फिर विकास के रास्ते में गड्ढे कैसे आ गये?

विकास तो समय दर समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा है. पहले IIT, AIIMS, Universities, Metro, Highways, दुरंतो और राजधानी एक्सप्रेस मिला और अब वन्दे भारत मिल रहा है. रोजगार का बैलेंस बनाने के लिए नोएडा, दिल्ली, गुड़गांव, पुणे, चेन्नई, कोलकत्ता, बैंगलोर जैसे शहरों का विकास हुआ और वहां MNCs खुलीं, लाखों को रोजगार मिला. लेकिन इन MNC s की संख्या कम क्यों हो रही है? केवल इतना ही नहीं समझना है, समझना तो ये भी है कि ये चुनावी चंदा (electoral bonds) आता कहाँ से है और इसका होता क्या है?

चुनावी चंदे का मतलब आप समझ चुके होंगें जिसे इलेक्टोरल बॉन्ड (electoral bonds) कहा जाता है. मोदी सरकार के एक कानून की ने इसका स्वरुप बदल दिया. इसका मतलब है कि कोई भी किसी भी राजनितिक दल को sbi के ब्रांच में जाकर चन्दा के रूप में पैसा दे सकता है और उसका नाम गुप्त रहेगा. मोदी सरकार को 10 साल हो गये न जाने कितने चंदे मिले. अब तो सुप्रीम कोर्ट का हंटर चल चल गया. और चंदा देने वालों के नाम सामने आने लगे. उसमे भी आरोप है कि SBI चालाकी कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट कह रही है बताओ किसने कितना चंदा दिया.

अब किसने क्यों चंदा दिया ये आप फिलहाल अपने हिसाब से समझिये. लेकिन आंकड़ों के अनुसार भाजपा को 6000 करोड़ का चंदा (electoral bonds) मिला है, उसके तृणमूल को 16 सौ और कांग्रेस को करीब 14 सौ, उसके बाद अन्य हैं जो धीरे धीरे कम हैं. कहाँ 6000 करोड़ और कहाँ 16 सौ या 14 सौ? अब चंदा (electoral bonds) या तो श्रद्धा से दिया गया होगा या फायदे के लिए क्यों कि आरोप तो बहुत हैं…

भाजपा कहती है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भ्रष्टाचार किया है. इसलिए उनपर कार्रवाई भी हो रही है, चलिए ठीक है. लेकिन आपने 6000 करोड़ का क्या किया. अआपके उम्मीदवारों के पास तो इतना धन है ही कि वो इमानदारी से अपने काम दिखा कर, कम खर्च कर वोट मांग सकते हैं. अब 543 लोकसभा सीटों को 6000 करोड़ से भाग दे दीजिये तो करीब करीब 11 करोड़ प्रति लोकसभा आएगा. अब आप हर लोकसभा के शहरी क्षेत्र में एक ऐसे भव्य मार्किट को विकसित कर देते जिसमे करीब 500 दुकानों खुल जाती और 5000 को रोजगार मिल जाता. बहुत दिक्कत होती तो बड़े शहरों में नहीं खोलते, वहां तो बड़े बड़े मार्किट पहले से हैं. तब तो राष्ट्रहित की बात भी होती और विपक्ष भ्रष्टाचारी भी कहलाता है.

हम सब भारत के नागरिक हैं और एक दुसरे से बहुत प्यार करते हैं, तभी किसी अनजान घर का एक बच्चा सरहद पर जाकर पुरे देश की रक्षा का प्राण लेता है. हमें समझदारी से उंच नीच की भावना को त्याग कर एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना होगा तभी हमारे तंत्र से भ्रष्टाचार भी कम होगा और हमारे बिच अरबपति नहीं एक सामान्य और ईमानदार जनप्रतिनिधि भी होगा. जय हिन्द .

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