रणभेरी बज चुकी है…चुनाव आयोग के 7 चरणों में मतदान कराने के एलान के साथ ही अगले तीन महीने पूरा देश चुनावी रंग में रंग जाएगा। वादों-इरादों के अनोखे और अलग-अलग रंग देखने को मिलेंगे। मैदान में ताल ठोक रहे राजनेता सत्ता का सिंहासन पाने के लिए हर सियासी दांव-पेच आजमाते नजर आएंगे।
सवाल कई होंगें और जवाब का इंतज़ार भी होगा. लेकिन क्या सभी सवालों के जवाब मिल जायेगें.
इस लोकसभा चुनाव को लेकर मुद्दों और आंकड़ों को समझने की जरुरत भी है और मुद्दों पर सवाल भी हैं.
- क्या जम्मू – कश्मीर और लद्दाख में 370 के खात्मे का रंग दिखेगा?
- क्या गुजरात में तीन दशक से खड़ा हुआ भाजपा का अभेद्य किला कोई भेद पायेगा?
- हिमाचल प्रदेश में बगावत के चलते कांग्रेस संकट में है. तो क्या इसका असर चुनाव पर पड़ेगा?
- पंजाब में किसान आन्दोलन के बिच बहुध्रुवीय लडाई दिख रही है. क्या भाजपा इसका सामना कर पायेगी?
- क्या हरियाणा में विपक्ष के लिए महिला पहलवानों के कथित यौन उत्पीड़न व किसान आंदोलन का मुद्दा काम आएगा या ब्रांड मोदी ही कमाल दिखायेगा?
- क्या आप के गढ़ राजधानी दिल्ली में भाजपा इतिहास दोहराएगी?
- शिवसेना – एनसीपी – क्या असली नकली लडाई का असर महाराष्ट्र पर पड़ेगा?
- क्या सनातन पर टिप्पड़ी का असर तमिलनाडु में दिखेगा?
- लोकसभा के संग विधानसभा चुनाव- क्या आन्ध्र प्रदेश के लिए बड़ी चुनौती है?
- बीजद-भाजपा की दोस्ती क्या ओडिशा में दिखाएगी कमाल?
- क्या तेलंगाना में विधानसभा की हर के बाद तस्वीर बदल पायेगी भाजपा?
- जेल से सत्ता को बचाते बचाते – क्या झारखण्ड में सीटें बचा पायेंगें हेमंत सोरेन?
- क्या कर्नाटका और असम में बरकरार रहेगी भाजपा?
- त्रिपुरा में शून्य से शिखर तक पहुँचने वाली भाजपा क्या अरुणाचल में कमाल कर पायेगी?
- क्या पश्चिम बंगाल का सन्देश संदेशखाली में छिपा है?
इन सभी सवालों का जवाब मिलेगा. लेकिन 4 जून के बाद. फिलहाल हम 2019 के आंकड़ों से वर्तमान को समझने की कोशिश करते हैं.

लोकसभा चुनाव में सबकी निगाहें एक बार फिर से हिंदी पट्टी के दस राज्यों पर हैं। लोकसभा में 225 सांसद भेजने वाले यह दस राज्य आजादी के बाद से अब तक दलों-गठबंधनों के लिए दिल्ली का रास्ता तैयार करते हैं। बीते चुनाव में इन्हीं राज्यों में दमदार प्रदर्शन ने भाजपा की लगातार दूसरी बार अपने दम पर सत्ता हासिल करने की हसरत पूरी की, तो इन्हीं राज्यों के मतदाताओं ने कांग्रेस के लिए सत्ता का सूखा खत्म करना तो दूर प्रतिष्ठा बचाने लायक भी नहीं छोड़ा। इन दस राज्यों के मतदाताओं में हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय के प्रति गहरा आकर्षण रहा है। बीते चुनाव में इन तीनों ही मोर्चे पर भाजपा बेहतर बूथ प्रबंधन और बेहतर रणनीति की बदौलत अपने विरोधियों पर भारी पड़ी। कांग्रेस को जहां इन राज्यों में अपने दम पर महज 5 सीटें आई थी, वहीं भाजपा ने अपने दम पर 177 तो सहयोगियों के साथ 203 सीटें जीत कर विपक्ष की कमर तोड़ दी थी।
हिंदी पट्टी में यूपी (80), बिहार (40), मध्यप्रदेश (29) झारखंड (14), राजस्थान (25), हरियाणा (10), दिल्ली (7), उत्तराखंड (5), हिमाचल (4) और छत्तीसगढ़ (11) राज्य शामिल हैं।
NDA के मुद्दे:
भाजपा खासकर कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के नेताओं की हिंदी और हिंदीविरोधी टिप्पणी को मुद्दा बना रहा है। भाजपा ने इस क्षेत्र में हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाने के साथ सोशल इंजीनियरिंग के तहत कई क्षेत्रीय दलों को साधा है।
विपक्ष के मुद्दे:
कांग्रेस की अगुवाई वाला इंडिया ब्लॉक ने हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय को अहम मुद्दा बनाया है। इसके तहत केंद्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना, जनादेश मिलने के बाद जाति की संख्या के आधार पर आरक्षण देने का वादा किया है। महंगाई और बेरोजगारी के सवाल को भी उठाया जा रहा है।
भाजपा की चुनौती भी कम नहीं है…
बीते चुनाव में हिंदी पट्टी ने ही भाजपा की लगातार दूसरी बार धमाकेदार जीत की पटकथा लिखी थी। पार्टी ने तब सहयोगियों के सहारे पांच राज्यों राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल, उत्तराखंड और हरियाणा में क्लीन स्वीप किया था। गठबंधन को बिहार की 40 में से 39, झारखंड की 14 में से 12 और अपने दम पर मध्यप्रदेश की 29 में 28, छत्तीसगढ़ की 11 में नौ और यूपी की 80 में से 64 सीटें हाथ लगी थी। जाहिर तौर पर अगर भाजपा ने पुराना प्रदर्शन नहीं दोहराया तो उसका चार सौ पार का नारा परवान चढ़ना तो दूर सत्ता बचाने के लिए संघर्ष करना होगा।
बसपा के साथ कांग्रेस-सपा गठबंधन पर नजर
हिंदी पट्टी के केंद्र में उत्तर प्रदेश है, जहां इस बार नए समीकरण बने हैं। बसपा अकेले मैदान में है।
रालोद ने सपा का साथ छोड़ दिया है तो सपा कांग्रेस के साथ है। भाजपा अपना दल, रालोद, सुभासपा और निषाद पार्टी के साथ मैदान में है।
बसपा, सपा दोनों के लिए यह चुनाव करो या मरो का सवाल है। भाजपा के सहयोगियों ने अगर बेहतर प्रदर्शन में मदद नहीं की तो इनकी प्रासंगिकता भी घटेगी।
अब सवाल कई हैं और सवाल तो चुनाव आयोग के प्रेस वार्ता में भी पूछे गयें. और सवाल तो विपक्ष भी पूछ रहा है. लोकतंत्र में सवाल पूछना बहुत जरुरी है, जब सवाल ही नहीं पूछें जायेंगें तो फिर लोकतंत्र कैसा? हम सब को पता है भारत सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है और यहाँ सवाल पूछने पर पाबन्दी नहीं है और इस लोकतंत्र में सवाल पूछने पर कोई भी देशभक्त बुरा नहीं मानता है और नहीं बदला लेता है. सही कहा न मैंने. आपके भी कोई सवाल हों तो आप कमेंट बॉक्स में पूछिये. जय हिन्द

