दुनियाभर में मौसम के बदलते स्वरूप के बीच एक बार फिर अल नीनो (El Nino) को लेकर चिंता बढ़ गई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization-WMO) ने आशंका जताई है कि इस वर्ष अल नीनो प्रभाव विकसित हो सकता है, जिसका असर भारत (India) सहित दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ सकता है। अल नीनो को आमतौर पर सूखा, हीटवेव, अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कुछ अन्य मौसमीय कारक मानसून को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
WMO ने जताई अल नीनो बनने की आशंका:
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की मौसम एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में समुद्री जल का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। इसी कारण जून से अगस्त के बीच अल नीनो बनने की संभावना लगभग 80 प्रतिशत तक बताई गई है। वहीं वर्ष के अंत तक इसके बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक आंकी गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार समुद्र की सतह के नीचे का पानी सामान्य स्तर से लगभग 6 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म पाया गया है। यही अतिरिक्त गर्मी समुद्री सतह के तापमान को बढ़ा रही है, जिससे अल नीनो की स्थिति मजबूत हो सकती है।
दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है व्यापक असर:
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो का प्रभाव केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करता है। इसके कारण कई देशों में वर्षा की कमी और सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। वहीं कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ की घटनाएं भी सामने आ सकती हैं।
इसके अलावा समुद्री और स्थलीय हीटवेव की घटनाओं में वृद्धि होने की संभावना भी जताई जा रही है। ऐसे में कृषि, जल संसाधन और जनजीवन पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
भारतीय मानसून के लिए क्या है स्थिति:
अल नीनो का नाम सामने आते ही भारत में सबसे बड़ी चिंता मानसून को लेकर होती है, क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था काफी हद तक वर्षा पर निर्भर है। यदि अल नीनो का प्रभाव अधिक मजबूत होता है तो मानसूनी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।
हालांकि मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार कुछ ऐसे प्राकृतिक मौसमीय तंत्र भी सक्रिय हैं, जो अल नीनो के संभावित प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। यही वजह है कि फिलहाल मानसून को लेकर पूरी तरह नकारात्मक स्थिति नहीं मानी जा रही है।
IOD और MJO बन सकते हैं राहत का कारण:
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इंडियन ओशन डायपोल (Indian Ocean Dipole-IOD) और मैडेन-जूलियन ऑस्सिलेशन (Madden-Julian Oscillation-MJO) भारत के लिए राहत प्रदान कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि IOD सकारात्मक स्थिति में रहता है तो यह अल नीनो के प्रतिकूल प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर सकता है और देश में बेहतर वर्षा की संभावना बढ़ा सकता है। वहीं MJO बादलों और हवाओं से जुड़ा एक वैश्विक मौसमीय चक्र है, जो भारत के ऊपर सक्रिय होने पर कमजोर मानसून के दौरान भी अच्छी बारिश ला सकता है।
कृषि क्षेत्र पर विशेष नजर:
संभावित मौसमीय बदलावों को देखते हुए कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) ने राज्यों और संबंधित एजेंसियों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। मंत्रालय ने जिलास्तर पर तैयारियां मजबूत करने और किसानों तक मौसम संबंधी सूचनाएं तेजी से पहुंचाने पर जोर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जानकारी और बेहतर तैयारी से संभावित जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। फिलहाल मौसम से जुड़े सभी प्रमुख संस्थान हालात पर लगातार निगरानी बनाए हुए हैं।
आने वाले सप्ताह होंगे महत्वपूर्ण:
अल नीनो को लेकर आशंकाएं जरूर बढ़ी हैं, लेकिन मौसम के अन्य सक्रिय कारक अंतिम तस्वीर तय करेंगे। आने वाले कुछ सप्ताह यह स्पष्ट करेंगे कि भारत में मानसून सामान्य रहेगा या फिर मौसम नई चुनौतियां लेकर आएगा। फिलहाल वैज्ञानिक संस्थाएं और सरकारी एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं।
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