उत्तर प्रदेश में परिषदीय और माध्यमिक विद्यालयों की शैक्षिक गुणवत्ता को नए सिरे से परखने और सुदृढ़ करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। राज्य में स्कूलों के मूल्यांकन की व्यवस्था को पारदर्शी, सरल और पूरी तरह डिजिटल बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह नई प्रणाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के अनुरूप तैयार की जा रही है, ताकि विद्यालयों में गुणवत्ता सुधार को दंड या दबाव के बजाय सहयोग, मार्गदर्शन और आत्ममूल्यांकन के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सके।
लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला के दौरान इस व्यवस्था के उद्देश्य और स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की गई। यह कार्यशाला एससीईआरटी (SCERT) के गंगा सभागार में आयोजित की गई, जिसमें राज्य भर से शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारी, विशेषज्ञ, प्रधानाचार्य और शिक्षक शामिल हुए।
SQAaF के जरिए होगा स्कूलों का मूल्यांकन:
इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव, बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा, उत्तर प्रदेश शासन पार्थ सारथी सेन शर्मा ने कहा कि स्कूल क्वालिटी असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन फ्रेमवर्क (SQAaF) के माध्यम से विद्यालयों का मूल्यांकन अब निरीक्षण या दंड आधारित नहीं होगा। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यालयों को अपनी शैक्षिक स्थिति का स्वयं आकलन करने और आवश्यक सुधार की दिशा तय करने में मदद करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फ्रेमवर्क स्कूलों को कमजोर ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सशक्त बनाने के लिए लागू किया जा रहा है।
पारदर्शिता और सरलता पर विशेष जोर:
पार्थ सारथी सेन शर्मा ने कहा कि SQAaF को इस तरह डिजाइन किया गया है कि पूरी प्रक्रिया डिजिटल, पारदर्शी और उपयोगकर्ता के अनुकूल हो। इससे विद्यालयों को अनुपालन में किसी प्रकार की जटिलता का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि इस फ्रेमवर्क के दो प्रमुख घटक हैं—स्टैंडर्ड्स और मैकेनिज्म। मैकेनिज्म के जरिए मूल्यांकन की प्रक्रिया तय की जाएगी, जबकि स्टैंडर्ड्स के माध्यम से यह स्पष्ट किया जाएगा कि विद्यालयों की गुणवत्ता किन आधारों पर परखी जाएगी।
प्रधानाचार्य, शिक्षक और अभिभावकों की भूमिका स्पष्ट:
अपर मुख्य सचिव ने कहा कि नए मूल्यांकन तंत्र में प्रधानाचार्य, शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक सभी की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित की गई है। सभी हितधारकों को यह समझने में आसानी होगी कि विद्यालय का मूल्यांकन किन बिंदुओं पर हो रहा है और सुधार की दिशा क्या होनी चाहिए। इससे विद्यालयों में पारदर्शिता बढ़ेगी और गुणवत्ता सुधार एक साझा प्रयास के रूप में सामने आएगा।
समग्र विकास को केंद्र में रखकर मूल्यांकन:
SQAaF के तहत केवल शैक्षणिक परिणामों पर ही नहीं, बल्कि बच्चों के समग्र विकास पर भी ध्यान दिया जाएगा। मूल्यांकन में पाठ्यक्रम, शिक्षण प्रक्रिया, विद्यालय और समुदाय की सहभागिता, विद्यालय का सामाजिक प्रभाव और पाठ्य सहगामी गतिविधियों को भी शामिल किया गया है। पार्थ सारथी सेन शर्मा ने कहा कि बच्चों के सर्वांगीण विकास को केंद्र में रखकर ही इस पूरी व्यवस्था को लागू किया जा रहा है।
शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव नहीं होगा:
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य शिक्षकों और अधिकारियों पर अतिरिक्त दबाव डालना नहीं है। मूल्यांकन को सहयोगात्मक और सहायक बनाया जाएगा, ताकि शिक्षक और विद्यालय प्रशासन इसे एक अवसर के रूप में देखें, न कि किसी तरह की जांच या सजा के रूप में।
सकारात्मक शैक्षिक अनुभव पर जोर:
कार्यशाला को संबोधित करते हुए महानिदेशक, स्कूल शिक्षा, उत्तर प्रदेश मोनिका रानी ने कहा कि विद्यालय केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षकों और अभिभावकों के लिए भी एक सकारात्मक अनुभव का केंद्र होने चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल विषय पढ़ाने वाले नहीं होते, बल्कि बच्चों के मार्गदर्शक भी होते हैं। इसी सोच के साथ SQAaF को संवेदनशील और सहयोगात्मक दृष्टिकोण से लागू किया जाएगा।
विशेषज्ञों ने दी विस्तृत जानकारी:
कार्यशाला के दौरान एससीईआरटी, एसएसएसए और अन्य शैक्षिक संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों ने SQAaF की संरचना, प्रक्रिया और क्रियान्वयन को लेकर विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिए। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से यह बताया गया कि किस तरह यह फ्रेमवर्क विद्यालयों की आंतरिक गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायक होगा।
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की दिशा:
कार्यशाला में मौजूद प्रधानाचार्यों और शिक्षकों ने भी इस पहल को शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक अहम कदम बताया। उनका मानना है कि यदि मूल्यांकन प्रक्रिया सरल और सहयोगात्मक होगी, तो विद्यालय अपने स्तर पर सुधार के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकेंगे।
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