यूपी में अभिनेता रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलचल मची हुई है। फिल्म में अतीक अहमद के किरदार और नोटबंदी को मास्टर स्ट्रोक के रूप में दिखाए जाने को लेकर कई नेताओं और समाजसेवी व्यक्तियों ने आपत्ति जताई है। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद (Saharanpur, UP) ने इसे बकवास करार दिया और कहा कि इस पर यकीन कौन करेगा।
सियासी आलोचना और आरोपों का सिलसिला:
पूर्व सपा सांसद एसटी हसन (UP) ने कहा कि अतीक अहमद का किसी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI (Pakistan) से संबंध था या नहीं, इस पर भारतीय खुफिया और पुलिस एजेंसियों ने कोई खुलासा नहीं किया है। ऐसे में फिल्म में जो दिखाया गया है, उसका कोई आधार नहीं है। वहीं, AIMIM नेता वारिस पठान (UP) ने फिल्म को मुसलमानों को टारगेट करने वाला बताया और कहा कि समाज में नफरत फैलाने वाली ऐसी फिल्मों पर तुरंत बैन लगाया जाना चाहिए।
नोटबंदी को मास्टर स्ट्रोक नहीं मानते सांसद:
इमरान मसूद ने कहा कि नोटबंदी मास्टर स्ट्रोक नहीं थी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला कदम था। उन्होंने कहा कि फिल्म में इसे गलत तरीके से महिमामंडित किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार के पास अब विकास के मुद्दे नहीं बचे हैं, इसलिए समाज में नफरत फैलाने की राजनीति की जा रही है।
एसटी हसन का फिल्म उद्योग पर तंज:
एसटी हसन ने कहा कि आज फिल्में समाज को संदेश देने के बजाय सियासी उद्देश्य के लिए बनाई जा रही हैं। उनका कहना था कि फिल्म वाले नफरत फैलाने के लिए किसी पार्टी से पैसा लेते हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसी फिल्में हिंदू-मुस्लिम के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रही हैं।
चुनावी माहौल में रिलीज़ को लेकर सांसद की प्रतिक्रिया:
घोसी से सपा सांसद राजीव राय (Ghhosi, UP) ने कहा कि चुनाव के समय ऐसी फिल्में जानबूझकर रिलीज की जाती हैं, ताकि माहौल प्रभावित हो। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इन फिल्मों को परोक्ष समर्थन देती है और उदाहरण के तौर पर ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्मों का हवाला दिया।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का आर्थिक मकसद:
ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी (Bareilly, UP) ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री समाज में विवाद खड़ा करके पैसा कमाने की कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि पहले फिल्में समाज को संदेश देने और बदलाव लाने के लिए बनाई जाती थीं, लेकिन अब केवल आर्थिक लाभ ही मकसद बन गया है।
समाज में बढ़ते विवाद पर चिंता:
राजनेताओं और समाजसेवियों के अनुसार, फिल्म उद्योग की इन फिल्मों से समाज में धार्मिक और राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है। आलोचक यह भी कहते हैं कि ऐसे विवाद केवल प्रचार और व्यवसाय के उद्देश्य से तैयार किए जा रहे हैं, जबकि फिल्में पहले शिक्षित और जागरूक समाज बनाने का साधन हुआ करती थीं।
अतिरिक्त बयान और सुझाव:
राजीव राय और अन्य नेताओं का मानना है कि फिल्म निर्माताओं को जिम्मेदारी से विषय चुनना चाहिए। विवादित सामग्री से दूर रहकर फिल्में केवल कला और सामाजिक संदेश देने के उद्देश्य से बनाई जानी चाहिए।
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