उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के कथित फर्जी डिग्री मामले में सोमवार को हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है, दरअसल प्रयागराज के BJP नेता और सोशल एक्टिविस्ट दिवाकर नाथ त्रिपाठी ने दावा किया है कि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने साल 2014 में फूलपुर लोकसभा सीट से नामांकन के दौरान हलफनामे में अपनी डिग्री BA बताई। इसमें दिखाया गया कि उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन से साल 1997 में BA किया है। डिप्टी सीएम ने साल 2007 में प्रयागराज के पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। इस समय जो हलफनामा दिया गया, उसमें बताया गया कि उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन से 1986 में प्रथमा, 1988 में मध्यमा और 1998 में उत्तमा की थी। प्रथमा की डिग्री को कुछ राज्यों में हाईस्कूल, मध्यमा को इंटर और उत्तमा को ग्रेजुएट के समकक्ष मान्यता दी जाती है। हिंदी साहित्य सम्मेलन बीए की डिग्री नहीं देता। इसलिए हलफनामे में दी गई जानकारी गलत है।
खबर के अनुसार उनका कहना है कि अगर वह उत्तमा को ही BA की डिग्री बता रहे हैं तो दोनों के पास करने वाले साल अलग-अलग क्यों हैं? मतलब, 2007 के हलफनामे में उत्तीर्ण करने वाला साल 1998 लिखा है, जबकि साल 2012 और 2014 के चुनावी हलफनामों में यही 1997 लिखा गया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिवाकर त्रिपाठी का कहना है कि मैंने स्थानीय थाना, एसएसपी से लेकर यूपी सरकार और केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में प्रार्थना पत्र देकर कार्रवाई की मांग की, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए मुझे कोर्ट जाना पड़ा।
अब बड़ा सवाल है कि कोर्ट में क्या हुआ? दरअसल त्रिपाठी ने 2021 में प्रयागराज की अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की अदालत में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत एक आवेदन दायर कर पुलिस जाँच की मांग की थी, याचिका में कहा गया था कि केशव प्रसाद मौर्य ने फर्जी डिग्री लगाकर 5 अलग-अलग चुनाव लड़े। कौशांबी में फर्जी डिग्री के आधार पर ही इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन से पेट्रोल पंप हासिल किया। इसलिए उनके खिलाफ FIR दर्ज हो।
हालांकि, ACJM नम्रता सिंह ने कहा था कि मौर्य के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, और इस आधार पर त्रिपाठी का आवेदन खारिज कर दिया गया था। इसके बाद त्रिपाठी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। फरवरी 2024 में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए त्रिपाठी की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी थी कि यह ट्रायल कोर्ट के आदेश के 300 दिनों से अधिक समय बाद दाखिल की गई थी। इसके बाद त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने देरी को माफ करते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह इस मामले की मेरिट पर सुनवाई करे। इसके अनुपालन में त्रिपाठी ने अप्रैल 2025 में फिर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जिसमें वही आरोप दोहराए गए थे। इस पर मई में सुनवाई पूरी हुई थी। याचिकाकर्ता की तरफ से वकील रमेश चंद्र द्विवेदी और यूपी सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने और शासकीय अधिवक्ता एके संड ने बहस की। सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कहा था- याची ने अधीनस्थ अदालत में झूठा हलफनामा दाखिल किया है। जो आरोप लगाया गया है, उससे अपराध संज्ञेय नहीं है। फिर 23 मई 2025 को हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया। आज 7 जुलाई को पुनर्विचार याचिका कोर्ट ने खारिज कर दिया। जस्टिस संजय कुमार सिंह की सिंगल बेंच ने फैसला सुनाया।
मतलब एक भाजपा नेता ने भाजपा के ही उपमुख्यमंत्री पर आरोप लगाया, शिकायत की और कोर्ट तक गये, लेकिन याचिका ख़ारिज होती गयी। फिलहाल तो फर्जी डिग्री का मामला आरोप बनकर ही रह गया है, सवाल है अब इस मामले में आगे क्या होगा?
