बिहार में 4 सितंबर को बीजेपी द्वारा बुलाए गए बंद ने एक बड़ा राजनीतिक विमर्श खड़ा कर दिया है। पीएम नरेंद्र मोदी की मां के खिलाफ अपशब्द कहे जाने के विरोध में बुलाए गए इस बंद के दौरान कई जगहों पर बदसलूकी और हिंसक घटनाएं सामने आईं। खबर के अनुसार जहानाबाद में एक टीचर दीप्ति रानी को सड़क पर रोककर उनकी गाड़ी से उतारा गया और महिला कार्यकर्ताओं ने उनका हाथ पकड़कर आगे बढ़ने से रोका। पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद थे, लेकिन वे मूकदर्शक बने रहे। भागलपुर में पति-पत्नी के साथ धक्का-मुक्की हुई और पटना हाई कोर्ट के जज की गाड़ी तक रोक दी गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इस बंद से बीजेपी को राजनीतिक लाभ हुआ या नुकसान।
हर जिले में असर, लेकिन जनता हुई परेशान
बंद का असर पूरे बिहार के 38 जिलों में दिखा। पटना के डाक बंगला चौराहा और इनकम टैक्स गोलंबर पर घंटों ट्रैफिक रुका रहा। नेशनल और स्टेट हाईवे जाम कर दिए गए, दुकानों को जबरन बंद कराया गया और आम लोगों की गाड़ियां रोक दी गईं। आमजन को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पीएम मोदी की मां को गाली देने पर जनता में पहले से ही विपक्ष के खिलाफ गुस्सा और मोदी के पक्ष में सहानुभूति थी, लेकिन बंद के दौरान हुई झड़पों और बदसलूकी ने उस सहानुभूति को कमजोर कर दिया। बंद से लोगों में नाराजगी ज्यादा और समर्थन कम देखने को मिला।
एनडीए की अंदरूनी खामोशी और महिला वोट बैंक की राजनीति
इस बंद के दौरान बीजेपी के कार्यकर्ता तो सक्रिय दिखे, लेकिन एनडीए की बाकी पार्टियों ने दूरी बनाए रखी। जेडीयू और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के झंडे कुछ जगहों पर जरूर दिखे, लेकिन बड़े नेता और संगठन सड़कों पर नदारद रहे। पॉलिटिकल एनालिस्ट्स का मानना है कि इसके पीछे महिला वोट बैंक की राजनीति है। बिहार की राजनीति में महिला वोटर का अहम योगदान रहा है। 2015 में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की वोटिंग प्रतिशत ज्यादा रहा था और इसका फायदा नीतीश कुमार की जेडीयू को मिला था।
चुनावी रणनीति पर असर
बीजेपी ने बंद को महिला सम्मान के नाम पर बुलाया था, लेकिन बंद के दौरान महिलाओं के साथ हुई बदसलूकी ने इसका संदेश कमजोर कर दिया। महिला वोट बैंक पर पहले से जेडीयू की पकड़ मजबूत मानी जाती है। अब सवाल यह है कि क्या यह बंद बीजेपी के लिए राजनीतिक नुकसानदायक साबित होगा। पीएम मोदी ने इसे सिर्फ अपनी मां का नहीं, बल्कि देश की बेटियों का अपमान बताया था, लेकिन बंद के दौरान हुई घटनाओं ने इस मुद्दे को उलझा दिया। चुनावी मैदान में इसका असर आने वाले समय में साफ दिखाई देगा।



