पटना, विशेष रिपोर्ट। बिहार की मिट्टी ने हमेशा ऐसे सपूत दिए हैं जिन्होंने इतिहास बदल दिया। उन्हीं में से एक थे डॉ. श्री कृष्ण सिंह (श्री बाबू), बिहार के पहले मुख्यमंत्री। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि ईमानदारी, संघर्ष और दूरदर्शिता के प्रतीक थे। आज उनकी जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ़ इतिहास पढ़ना नहीं है, बल्कि खुद को बेहतर बनाने की प्रेरणा लेना भी है।
बचपन से संघर्ष की सीख
21 अक्टूबर 1887 को शेखपुरा जिले के मऊर गाँव में जन्मे श्री बाबू का बचपन बहुत साधारण था। लेकिन साधारण हालात में भी उनके सपने बड़े थे। शिक्षा के प्रति लगन इतनी थी कि कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई जारी रखी और कानून की डिग्री हासिल की।
छात्र जीवन से ही उनमें नेतृत्व की झलक दिखने लगी थी। वे मानते थे कि ज्ञान ही इंसान को मजबूत बनाता है। यही कारण है कि आगे चलकर उन्होंने शिक्षा को बिहार के विकास का आधार बनाया।
स्वतंत्रता संग्राम में कदम
वकालत से करियर शुरू हुआ, लेकिन दिल में आग थी गुलामी के खिलाफ। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर वे आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़े। जेल गए, कठिनाइयाँ झेलीं, लेकिन कभी पीछे नहीं हटे।
उनकी आवाज़ किसानों, मजदूरों और नौजवानों की आवाज़ बन गई। इसी दौर में लोग उन्हें “बिहार केसरी” कहने लगे।
छात्रों और युवाओं के लिए यह सीख है कि बड़े बदलाव सिर्फ डिग्री से नहीं, बल्कि हिम्मत और सोच से आते हैं।

बिहार के पहले मुख्यमंत्री
1946 में वे बिहार के मुख्यमंत्री बने और 15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ तो वे पहले मुख्यमंत्री के तौर पर इतिहास में दर्ज हो गए। उनका कार्यकाल 1961 तक चला। यानी 13 साल से ज्यादा वे मुख्यमंत्री रहे। यह उनकी लोकप्रियता और जनता पर भरोसे की गवाही है।
उनका मानना था कि नेतृत्व पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। आज जब राजनीति में पद पाने की होड़ देखी जाती है, श्री बाबू की यह सोच युवाओं के लिए एक बड़ी सीख है।

अनुग्रह बाबू के साथ आदर्श जोड़ी
श्री बाबू और अनुग्रह नारायण सिंह (अनुग्रह बाबू) की जोड़ी को बिहार की राजनीति का सुनहरा अध्याय कहा जाता है। एक मुख्यमंत्री और दूसरा वित्त मंत्री — लेकिन दोनों का मकसद एक ही: जनता की सेवा।
उनकी साझेदारी दिखाती है कि अगर टीमवर्क ईमानदार हो तो विकास की रफ्तार दोगुनी हो जाती है।
छात्रों और युवाओं के लिए यह संदेश है कि सफलता अकेले नहीं, मिलकर काम करने से मिलती है।
ज़मींदारी का अंत: किसानों को मिला हक
आज हम जब किसान आंदोलन की बातें सुनते हैं, तो याद करना ज़रूरी है कि बिहार में किसानों को असली राहत श्री बाबू ने दिलाई थी। उन्होंने ज़मींदारी प्रथा को खत्म कर दिया।
यह कदम आसान नहीं था, क्योंकि बड़े-बड़े जमींदारों का दबाव था। लेकिन श्री बाबू ने कहा —
> “अगर किसान आज़ाद नहीं होंगे तो देश की आज़ादी अधूरी होगी।”
युवाओं के लिए यह मिसाल है कि कभी-कभी सही काम करने के लिए बड़े साहस की ज़रूरत होती है।
शिक्षा और उद्योग: दूरदर्शी सोच
श्री बाबू जानते थे कि केवल खेती से बिहार का विकास नहीं हो सकता। उन्होंने उद्योग और शिक्षा दोनों पर ज़ोर दिया।
- बरौनी रिफाइनरी
- सिंदरी और बरौनी खाद कारखाने
- हटिया का भारी इंजीनियरिंग संयंत्र
- बोकारो स्टील प्लांट
ये सब उनकी दूरदर्शी सोच का नतीजा थे।
शिक्षा के क्षेत्र में भागलपुर विश्वविद्यालय, रांची विश्वविद्यालय, पूसा कृषि कॉलेज और कोसी परियोजना जैसी योजनाएँ आज भी उनके विज़न की गवाही देती हैं।
यह युवाओं को बताता है कि सपना बड़ा होना चाहिए और सोच भविष्य की होनी चाहिए।
वोट न मांगने की अद्भुत मिसाल
श्री बाबू का चुनावी तरीका भी अलग था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वे कभी वोट मांगने नहीं जाते थे। 1957 के बरबीघा चुनाव में उन्होंने कहा:
> “अगर जनता को लगता है कि मैंने काम किया है तो वे वोट दें, वरना नहीं।”
सोचिए, आज जब नेता हर घर जाकर वादे करते हैं, उस दौर में श्री बाबू बिना प्रचार के भी जीत जाते थे। यह उनकी ईमानदारी और काम पर आधारित राजनीति का उदाहरण है।
युवाओं के लिए यह प्रेरणा है कि काम ही आपकी असली पहचान है, दिखावा नहीं।
सिद्धांतों पर अडिग नेता
श्री बाबू की सबसे बड़ी ताकत थी — समझौता न करना। जब भी जनता के हित पर चोट होती, वे चाहे केंद्र सरकार हो या राज्यपाल, किसी से भी भिड़ जाते। एक बार तो हालात ऐसे बने कि उन्होंने इस्तीफा देने तक की धमकी दे दी।
इससे पता चलता है कि वे पद से नहीं, जनता से ताकत लेते थे।
सादगी और प्रेरणादायी जीवन
इतने बड़े पद पर रहते हुए भी उनका जीवन बेहद सादा था। न दिखावा, न सत्ता का घमंड। यही कारण है कि जनता उन्हें आज भी आदर से याद करती है।
31 जनवरी 1961 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका नाम आज भी “आधुनिक बिहार का निर्माता” के रूप में लिया जाता है।
छात्रों और युवाओं के लिए संदेश
श्री बाबू का जीवन सिर्फ इतिहास नहीं है, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। कठिनाइयों में भी शिक्षा मत छोड़ो। बड़े सपने देखो और उनके लिए मेहनत करो। सही काम करने से मत डरना, भले ही लोग खिलाफ हों। दिखावे से नहीं, काम से पहचान बनती है। मिलकर काम करने से ही बड़ी सफलता मिलती है।
आज जब छात्र और युवा अपने करियर और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं, श्री बाबू की कहानी हमें यह सिखाती है कि ईमानदारी, साहस और सेवा का रास्ता ही असली सफलता की ओर ले जाता है।
श्री बाबू ने साबित कर दिया था कि नेता वही है जो जनता का भरोसा जीत ले और इंसान वही महान है जो अपने समाज के लिए कुछ कर जाए।
उनकी जयंती पर उन्हें याद करना मतलब खुद को यह वादा दिलाना कि हम भी अपने जीवन में सिद्धांत और सेवा को अपनाएँगे।