बंगाल में 5% वोट शिफ्ट से बदलेगा खेल: असम में मुस्लिम एकजुटता से बीजेपी पर खतरा, 5 राज्यों में बड़ा दांव

देश की राजनीति में पश्चिम बंगाल और असम आगामी चुनावों को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। आंकड़ों और पिछले चुनावी परिणामों के आधार पर यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि दोनों राज्यों में छोटे वोट प्रतिशत का बदलाव भी बड़े राजनीतिक परिणाम ला सकता है। जहां पश्चिम बंगाल में कुछ प्रतिशत वोट खिसकने से सत्ता का समीकरण बदल सकता है, वहीं असम में मतदाताओं की एकजुटता सरकार की वापसी पर असर डाल सकती है।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बढ़ती चुनौती:
पश्चिम बंगाल (West Bengal) में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की पार्टी टीएमसी (TMC) लंबे समय से सत्ता में है, लेकिन बीजेपी (BJP) लगातार अपनी पकड़ मजबूत करती दिख रही है। वर्ष 2015 में कैलाश विजयवर्गीय (Kailash Vijayvargiya) को बीजेपी का महासचिव बनाकर बंगाल की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उस समय राज्य में बीजेपी की स्थिति बेहद कमजोर थी, जहां उसके पास केवल 2 सांसद थे और एक भी विधायक नहीं था।

लोकसभा और विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन:
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़ा उछाल दिखाते हुए 42 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की। इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 38% वोट शेयर के साथ 77 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष का स्थान प्राप्त किया। वहीं टीएमसी को 48% वोटों के साथ 215 सीटें मिलीं और उसने सरकार बनाई।

5% वोट स्विंग से बदल सकता खेल:
विश्लेषण के अनुसार, 2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सरकार बनाने के बेहद करीब मानी जा रही है। यदि बीजेपी टीएमसी के वोट बैंक में से सिर्फ 5% वोट अपने पक्ष में कर लेती है, तो वह राज्य की नंबर-1 पार्टी बन सकती है। 2021 में बीजेपी ने 38 सीटें 5% के अंतर से और 75 सीटें 10% के अंतर से गंवाई थीं, ऐसे में पार्टी की रणनीति इन्हीं सीटों पर फोकस करने की हो सकती है। अनुमान है कि 5% वोट स्विंग होने पर बीजेपी की सीटें 150 से अधिक तक पहुंच सकती हैं।

एंटी-इनकम्बेंसी और स्थानीय मुद्दों का असर:
चुनावी विश्लेषक अमिताभ तिवारी (Amitabh Tiwari) के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में एंटी-इनकम्बेंसी, बेरोजगारी और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दे टीएमसी के लिए चुनौती बन सकते हैं। इन कारकों के कारण बीजेपी को चुनावी फायदा मिलने की संभावना जताई जा रही है।

असम में बीजेपी का राजनीतिक विस्तार:
असम (Assam) में बीजेपी का उदय 2015 के बाद तेजी से हुआ। उस समय कांग्रेस के प्रभावशाली नेता हिमंता बिस्व सरमा (Himanta Biswa Sarma) ने बीजेपी का दामन थामा। इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट और असम गण परिषद के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा और एनडीए (NDA) को 126 में से 86 सीटों पर जीत मिली।

पहली बार बनी बीजेपी सरकार:
इस जीत के साथ पहली बार नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी की सरकार बनी और सर्बानंद सोनोवाल (Sarbananda Sonowal) मुख्यमंत्री बने। इसके बाद बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) का गठन किया, जिसका संयोजन हिमंता बिस्व सरमा को सौंपा गया।

2021 में दूसरी बार सत्ता में वापसी:
2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने लगातार दूसरी बार बहुमत हासिल किया और इस बार हिमंता बिस्व सरमा मुख्यमंत्री बने। वर्तमान में वह नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं और पार्टी नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं।

मुस्लिम वोट और चुनावी समीकरण:
2026 के चुनाव में असम में बीजेपी की जीत काफी हद तक वोटों के ध्रुवीकरण पर निर्भर मानी जा रही है। यदि राज्य के 34% मुस्लिम मतदाता एकजुट होते हैं, तो बीजेपी के लिए सत्ता में वापसी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। वहीं पार्टी हिमंता के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।

नॉर्थ-ईस्ट में पकड़ बनाए रखने की चुनौती:
असम को नॉर्थ-ईस्ट का प्रवेश द्वार माना जाता है और यहां बीजेपी की मजबूत स्थिति पूरे क्षेत्र में उसके प्रभाव को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यदि पार्टी यहां कमजोर होती है, तो इसका असर अन्य राज्यों पर भी पड़ सकता है।

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