उत्तराखंड के प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम से जुड़ी एक अहम धार्मिक परंपरा को लेकर चर्चा तेज हो गई है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले होने वाली सबसे महत्वपूर्ण रस्म गाड़ू घड़ा यात्रा के लिए आमंत्रण भेजा गया है। उन्हें इस यात्रा में शंकराचार्य के रूप में शामिल होने का न्योता दिया गया है। यह आमंत्रण ऐसे समय में सामने आया है, जब शंकराचार्य और प्रयागराज (Prayagraj) माघ मेला प्रशासन के बीच शंकराचार्य पद को लेकर विवाद चल रहा है।
विवाद के बीच आया आमंत्रण:
प्रयागराज माघ मेला प्रशासन की ओर से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से शंकराचार्य होने से संबंधित प्रमाण मांगे गए थे। इस पर उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए जवाब दिया था। इसके बाद वह मेला क्षेत्र छोड़कर काशी (Kashi) चले गए। इसी क्रम में शुक्रवार को उन्होंने उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हिंदू होने का प्रमाण मांगा और इसके लिए 40 दिन का समय भी तय किया। ऐसे विवादास्पद माहौल के बीच बद्रीनाथ धाम से जुड़ी इस परंपरा के लिए उन्हें आमंत्रण मिलना धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
गाड़ू घड़ा यात्रा का धार्मिक महत्व:
श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के अध्यक्ष पंडित आशुतोष डिमरी के अनुसार, गाड़ू घड़ा यात्रा बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले निभाई जाने वाली सबसे प्रमुख परंपराओं में से एक है। इसी यात्रा के साथ चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। भगवान बद्री विशाल के अभिषेक और अखंड ज्योति के लिए उपयोग में आने वाला शुद्ध तिल का तेल इसी यात्रा के माध्यम से बद्रीनाथ धाम तक पहुंचाया जाता है।
कैसे होती है गाड़ू घड़ा यात्रा की शुरुआत:
गाड़ू घड़ा यात्रा की शुरुआत टिहरी (Tehri) जिले के नरेंद्र नगर (Narendra Nagar) स्थित राजमहल से होती है। यहां डिमरी समुदाय की सुहागिन महिलाएं व्रत रखकर पारंपरिक विधि से तिल का तेल निकालती हैं। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। शुद्धता बनाए रखने के लिए महिलाएं मुंह पर पीला कपड़ा बांधती हैं और सिलबट्टा, ओखली व हाथों की सहायता से तेल तैयार करती हैं।

चांदी के कलश में भरकर निकलती है यात्रा:
तैयार किए गए तिल के तेल को चांदी के कलश में भरा जाता है, जिसे गाड़ू घड़ा कहा जाता है। डिमरी पुजारी समुदाय की अगुवाई में इस कलश को सजे-धजे रथ में रखकर यात्रा शुरू होती है। यह यात्रा विभिन्न धार्मिक पड़ावों से गुजरते हुए बद्रीनाथ धाम तक पहुंचती है। कपाट खुलने के दिन इसी पवित्र तेल से भगवान बद्री विशाल का अभिषेक किया जाता है, जिसके साथ चारधाम यात्रा की विधिवत शुरुआत होती है।
कपाट खुलने की तिथि और यात्रा का कार्यक्रम:
पंडित आशुतोष डिमरी के अनुसार, इस वर्ष बद्रीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। कपाट खुलने की तिथि बसंत पंचमी के अवसर पर नरेंद्र नगर राजमहल में परंपरा के अनुसार घोषित की गई थी।
उन्होंने बताया कि 7 अप्रैल को नरेंद्र नगर राजमहल में विधि-विधान के साथ तिल का तेल निकाला जाएगा और उसी दिन गाड़ू घड़ा तैयार किया जाएगा। 8 अप्रैल को यह यात्रा ऋषिकेश (Rishikesh) स्थित बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के विश्राम गृह पहुंचेगी, जहां श्रद्धालुओं को इसके दर्शन का अवसर मिलेगा।
न्योता भेजने वाली संस्था की भूमिका:
श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत, बद्रीनाथ धाम से जुड़े डिमरी पुजारी समुदाय की प्रमुख धार्मिक संस्था है। इसमें चमोली (Chamoli) जिले के डिम्मर गांव के ब्राह्मण पुजारी शामिल हैं। यह पंचायत कपाट खुलने, गाड़ू घड़ा यात्रा, पूजा-अनुष्ठान और अन्य धार्मिक परंपराओं से जुड़े फैसले सामूहिक रूप से लेती है।
डिमरी ब्राह्मणों का ऐतिहासिक संबंध:
डिमरी ब्राह्मणों का संबंध आदि गुरु शंकराचार्य की परंपरा से माना जाता है। मान्यता है कि चारधाम स्थापना के समय शंकराचार्य ने उत्तर और दक्षिण भारत के पुजारियों की सेवा-परंपरा तय की थी। इसी परंपरा के तहत बद्रीनाथ धाम में केरल (Kerala) के नंबूरी ब्राह्मण मुख्य पुजारी होते हैं, जिन्हें रावल कहा जाता है, जबकि डिमरी ब्राह्मण अन्य महत्वपूर्ण रस्मों का निर्वहन करते हैं।
आज भी परंपराओं में अहम योगदान:
बद्रीनाथ धाम की प्राचीन परंपराओं के निर्वहन में डिमरी ब्राह्मणों की भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गाड़ू घड़ा यात्रा की शुरुआत से लेकर भगवान बद्रीनारायण को भोग अर्पित करने तक, कई प्रमुख धार्मिक कार्य इन्हीं के मार्गदर्शन में संपन्न होते हैं। ऐसे में शंकराचार्य को दिया गया यह आमंत्रण बद्रीनाथ की परंपराओं और समकालीन विवादों के बीच एक महत्वपूर्ण धार्मिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
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