ये कहानी है क्रांतिकारियों के जघन्य हत्याकाण्ड की. ये कहानी है तिरंगे के शान की. ये कहानी है स्वतंत्रता के प्रथम एहसास की, ये कहानी है उन वीरों के अद्भुद प्रयास की.
18 अगस्त 1942, जब उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गाँव स्वतंत्र हो गया, एक तरफ तिरंगा शान से फहरा रहा था और दूसरी तरफ़ गरीबों के घरों में अनाज पहुँचाया जा रहा था. हवाओं में आज़ादी की खुशबू बिखर चुकी थी, पवन के झोंके तिरंगे की शान को बढ़ा रहे थे, खुशियों के आंसू आसमान से बरस रहे थे लेकिन इन खुशियों उम्र कम थी और संघर्ष अभी बाकि था. गोलियों की तड़तड़ाहट से ऊँचा इन्कलाब का नारा था. बहते लघु का तिलक ललाट की शोभा बढ़ा रहा था. हर तरफ एक ही आवाज थी अंग्रेजों भारत छोड़ो…
8 अगस्त 1942 को जब कांग्रेस पार्टी ने अपने मुंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया था तो अंग्रेजों ने उसे शक्ति और सख्ती से कुचलने का फैसला किया. नतीजा यह हुआ कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस के नेता गिरफ्तार किए जाने लगे लेकिन अगले दिन यानी 9 अगस्त को क्रांतिकारीयों की एक टोली अरुणा आसिफ अली के नेतृत्व में बम्बई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया तो अंग्रेजों ने आंसू गैस के गोले छोड़े और यहीं से भारत छोड़ो आंदोलन का वास्तविक सूत्रपात हुआ और यह चिंगारी निकल कर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के नंदगंज तक पहुंच गई.
इस कहानी का जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विमोचित पुस्तक डिक्शनरी ऑफ मार्टियर्स के वॉल्यूम 2 के पेज नंबर 347 में मिलता है.

नंदगंज स्वतंत्रता आंदोलन के नायक मुश्ताक अहमद अपनी जीवनी में लिखते हैं महात्मा गांधी के आह्वान पर गाजीपुर की आवाम भी बहुत उत्साहित होकर अंग्रेजों को नुकसान पहुंचाने के लिए उतावली हो रही थी, 10 अगस्त 1942 के बाद जत्थे के जत्थे हमारे गांव कुर्बान सराय आने लगे और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन के लिए अपना सहयोग देने और सहयोग लेने की बात करने लगे, बरहपुर गांव के बाबू भोला सिंह, नैसारा के रामधारी पहलवान, नारी पचदेवरा के शहीद विश्वनाथ, मैनपुर के बड़े बबुआनो, विलासी के डोमा लोहार जैसे आमजन और जमींदार लोगों के मिलने से यह महसूस होने लगा कि अब अंग्रेजों को भगाना मुश्किल नहीं है तय हुआ कि सभी लोग जत्थे के साथ नंदगंज पहुंचे, तिथि तय हुई 18 अगस्त 1942 की.
डोमा लोहार को सबको खबर देकर के एक जगह इकट्ठा करने की जिम्मेदारी दी गई। अगले दिन ही रेलवे लाइन के आसपास खेतों में लोग इकट्ठा होने लगे। जुनेद आलम ,बाबू भोला सिंह, रामधारी पहलवान सबसे आगे चल रहे थे और 50 युवकों की टोली उनके पीछे-पीछे चल रही थी।उनसे थोड़ी दूरी बनाकर मुस्ताक अहमद का जत्था उनके पीछे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगा रहा था और अंग्रेजों भारत छोड़ो महात्मा गांधी जिंदाबाद का नारा लगाते हुए नंदगंज थाने के ठीक सामने भारी भीड़ जमा हो गई. थाना देखकर ही जनता आक्रोशित होने लगी, नंदगंज थाने का दरोगा कुछ सिपाहियों के साथ कोतवाली के गेट को बंद करके बंदुक हाथ में लेकर घबराहट में जोर-जोर से चिल्ला रहा था, वापस चले जाओ नहीं तो हमें गोली चलानी पड़ेगी.
वो तो क्रांतिकारी थे साहब उनको गोली से कहाँ डर था, 6 फुट लंबे हस्ट पुष्ट नौजवान जुनेद आलम, नामी पहलवान रामधारी यादव और बरहपुर के बाबू भोला सिंह ने थाने के बोसीदा कमजोर गेट को धकेल कर नंदगंज थाने में प्रवेश किया तो पुलिस कर्मियों ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. सैकड़ो क्रांतिकारियों ने नंदगंज थाने पर कब्जा कर लिया और अंग्रेजों का झंडा उतार कर तिरंगा लहरा दिया.
तिरंगा लहराने के बाद मुस्ताक अहमद और जुनैद आलम के नेतृत्व में क्रांतिकारी साथियों के साथ लोग नंदगंज रेलवे स्टेशन की ओर बढ़े। रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया, उसके बाद रेलवे पटरी को उखाड़ दिया गया, वहां से गुजर रही मालगाड़ी में अंग्रेजी सेना का हथियार और रसद लदा हुआ था, पटरी उखाड़ने के कारण ट्रेन रुक गई और क्रांतिकारी डोमां लोहार ने छेनी हथौड़ी से मालगाड़ी के सभी तले काट दिए और लोगों ने ट्रेन में रखे अनाज और रसद को गांव में बंटवा दिया.

इस दौरान पूरे 5 घंटे थाने और रेलवे स्टेशन पर तिरंगा शान से लहराता रहा. 5 घंटे बाद लगभग 2:00 बजे का वक़्त था. हवाओं में आज़ादी की खुशबु थी, आसमान से खुशियों के आंसू बरस रहे थे और तूफ़ान थम रहा था तभी अंग्रेज जिला अधिकारी और कप्तान नंदगंज पहुंचे, तब तक जुनेद आलम ,रामधारी पहलवान, मुस्ताक अहमद, अपने साथियों के साथ नंदगंज में डटे हुए थे. अंग्रेजो ने इनको देखते ही गोलियों की बौछार शुरू कर दी, जिसमें जुनेद आलम वही शहीद हो गए और मुस्ताक अहमद और रामधारी पहलवान सहित कई लोग घायल हुए और किसी तरह से वहां से निकलने में कामयाब रहे।
भारत सरकार के विभिन्न पुस्तको में जुनैद आलम का जिक्र होता रहा है।उसके बाद नन्दगज के क्रांतिकारी योद्धाओं पर अंग्रेजों ने ज़ुल्म की हद पार कर दी।
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