देश में अमीर का और अमीर बनना और गरीब का और गरीब बनते जाने का आरोप बेहद गंभीर है. वहीँ मिडिल क्लास तो अपने भविष्य को बनाने में ऐसे उलझ जाता है कि उसे सुलझाते सुलझाते जीवन बीत जाता है.
करीब 141 करोड़ जनसँख्या है भारत की और भारत सरकार के खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत लगभग 81.35 करोड़ लाभार्थियों (अर्थात अंत्योदय अन्न योजना वाले परिवार और प्राथमिकता वाले परिवार) को उनकी पात्रता के अनुसार मुफ्त अनाज दिया है.
अब 141 करोड़ की जनसँख्या में कितने परिवार होंगे इसका आंकलन लगाइए और फिर इसी आंकड़ों से ए भी आंकलन लगाइए की कितनी गरीबी है कि रोजगार की जगह मुफ्त अनाज बाटने की नौबत आ गयी.
खैर भोजन के साथ ही प्राथमिक शिक्षा बेहद ही महत्वपूर्ण है और सभी माता पिता या अभिभावकों को अपने बच्चों को स्कूल जरुर भेजना चाहिए. लेकिन सवाल है कि क्या गरीब का बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़कर अपने भविष्य को बना सकता है? क्या इस लायक बन सकता है कि वो प्राइवेट स्कूलों से शिक्षा लेने वाले छात्रों के बराबर खड़ा हो सके.
बिलकुल हो सकता है और ऐसे उदहारण मिल भी जायेंगें लेकिन बहुत कम. कुछ ऐसा ही कहा गाज़ीपुर के सांसद अफ़ज़ाल अंसारी ने संसद के अन्दर. अब सांसद जी ने बोलते बोलते हाथ को पॉकेट में डाल लिया तो सभापति महोदय को अच्छा नहीं लगा.
खैर ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल की स्थिति क्या है? ये बात किसी से छिपी नहीं है. कहीं जर्जर भवन की खबर आती है, कहीं जमीन पर बैठाकर बच्चों को पढ़ाने की खबर आती है, कहीं अध्यापक नदारत रहते हैं, कहीं सरकारी अध्यापकों की डयूटी गैर शिक्षण कार्य में लगा दी जाती है, कहीं बच्चों की संख्या ज्यादा है लेकिन शिक्षक एक है. सरकारी प्राथमिक स्कूलों और व्यवस्थाओं पर बताने के लिए बहुत कुछ है. आप केवल एक साल के अख़बारों को अध्ययन करें, सच्चाई आपके सामने होगी.
प्राइवेट स्कूलों में पैसे के दम मिलने वाली व्यवस्थाएं क्या सरकारी स्कूल में टैक्स के दम पर मिलती हैं? तो भला कैसे दोनों स्कूलों में पढने वाले बच्चों के शिक्षा का स्तर एक हो सकता है?
राज्य शिक्षा मंत्री जयन्त चौधरी द्वारा संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, हमारे देश में 10,32,570 सरकारी और 337499 प्राइवेट स्कूल हैं. वहीँ यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो जनसंख्या की दृष्टि से सबसे पड़ा राज्य माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में 137024 सरकारी और 97808 प्राइवेट स्कूल हैं.
यानी सरकारी स्कूलों की संख्या ज्यादा है और शिक्षा का स्तर और व्यवस्थाएं कैसी हैं ये तो देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को स्वयं छापा मारकर देखना चाहिए. सच्चाई सामने आ जाएगी.
अमीर के बच्चे बेहतर शिक्षा लेने में सक्षम होते हैं, लेकिन गरीब के बच्चे, जिसके प्राथमिक शिक्षा के स्तर का आंकलन लगाकर ही आपको समझ आ जायेगा कि वो आगे की शिक्षा कैसे ग्रहण करेंगें और जो संघर्ष कर आगे बढ़ते भी हैं तो गरीबी के वजह से फिर अपने क़दमों में जंजीर बांधनी पड़ती है.
और बात यदि मिडिल क्लास की करें तो शिक्षा में विश्वास रखने वाला समाज खाता कम है, पहनता कम है लेकिन शिक्षा पर खर्च ज्यादा करता है. वो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए प्राइवेट स्कूल भेजता है. प्राइवेट स्कूल स्व निर्मित नियमों के चक्रव्यूह में वो फसता जाता है. उन धन उगाही का शिकार होकर वो तड़पता है, बेबस हो जाता है. उसे पता है की ये स्कूल सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, लेकिन वो कुछ नहीं कर पता क्योंकि उसे पता है कि इन स्कूलों के चलाने वालों के आका कहाँ बैठे हैं और कितने ताकतवर हैं?
हम सभी निजी स्कूलों को दोषी नहीं मान सकते, इसी परिस्थियों में कई निजी स्कूल ऐसे हैं जो छात्रों को सस्ती और बेहतर शिक्षा भी दी रहे हैं.
