“Manoj Sinha” और Ghazipur में हार का पर्दाफाश ! Afzal vs BJP…

अभी बजरंगबली ने सोने की लंका जलाई है, रावण वध बाकि है.  खैर बात देश में बनने वाली सरकार की करें तो बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को आतंकवादी कहने वाले से समझौता कर लिया है. यही नहीं भाजपा को कई झटके देने वाले से भी समझौता कर लिया है. अब लोग कह रहे हैं कि मजबूत चेहरे की कमजोर सरकार NDA के रूप में बन रही है. लेकिन एक बात है नितीश कुमार ने मनमोहन सरकार के दौरान झटका नहीं दिया, वो सरकार 10 साल चली.

इस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा झटका लगा. गठबंधन की बल्ले बल्ले रही. राहुल गाँधी की न्याय यात्रा और अखिलेश यादव के समीकरण ने पूरा माहौल बदल दिया. CM योगी ने भी खूब रैलियां की. पीएम मोदी ने तो जान फूंक दिया, गाजीपुर में अमित शाह ने रोड शो कर दिया. लेकिन बड़ा सवाल है कि मोदी मैजिक और राम मंदिर के बाद भी उत्तर प्रदेश में भाजपा कैसे हार गयी. लोगों का कहना है कि अहंकार और टिकट बटवारे की निति ने भाजपा की रणनीति को बिगाड़ दिया. उत्तर प्रदेश में रायबरेली, अमेठी के साथ कोई सबसे ज्यादा चर्चित सीट थी तो गाजीपुर की सीट थी. और गाजीपुर की जनता अब खुल कर कहने लगी है कि ये हार भाजपा के प्रत्याशी पारसनाथ राय की नहीं है बल्कि मनोज सिन्हा की है, जी हाँ जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल, गाजीपुर के लाल, महामहिम मनोज सिन्हा की. वो कैसे तो पढ़िए…

चुनाव का आगाज हुआ, गाजीपुर में सवाल उठा की अफजाल अंसारी के सामने कौन? खबर आई कि भईया मनोज सिन्हा को टिकट नहीं मिलेगा वो अभी वहीँ की जिम्मेदारी संभालेंगें. मनोज सिन्हा के बेटे के नाम की चर्चा होने लगी, लेकिन परिवारवाद और अनुभव की कमी ने अभिवन सिन्हा के रास्ते में बाधा डाल दिया. अब सवाल था तो फिर कौन? तब राधेमोहन सिंह और विजय मिश्र का नाम तेजी से चलने लगा , फिर अरुण सिंह का नाम जुड़ गया.
अब राम मंदिर, मोदी लहर और गाजीपुर का सत्ता से सीधा जुड़े न होने के साथ इनके नाम के मिश्रण ने भाजपा समर्थकों की उम्मीद जगा दी.  राधेमोहन सिंह का नाम एक मजबूत राजनेता के रूप में लिया जाता है , वो लोकसभा चुनाव में अफजाल अंसारी को हरा भी चुके हैं. लोकसभा क्षेत्र में अच्छी पकड़ भी है, कई काम भी किये हैं. लेकिन समस्या ये थी कि उन्होंने सपा का साथ छोड़ तो दिया था, भाजपा से करीबी भी थी, लेकिन भाजपा को ज्वाइन नहीं किया था. इन समस्याओं को दूर करने में भाजपा तेज है लेकिन नहीं किया.

अब बात विजय मिश्र की, सपा सरकार में मंत्री थे, अपने पहले ही टर्म में गाजीपुर वालों को विकास से रूबरू करा दिया, गाजीपुर को गाजियाबाद बनाने का दावा करते थे, इन्होने ही गाजीपुर में 200 बेड का अस्पताल बनवाया, उस समय मेडिकल कॉलेज और स्टेडियम का  शिलान्यास किया, बिजली के क्षेत्र में उनके कार्य को आज भी याद किया जाता है, उस क्रन्तिकारी बदलाव ने गाजीपुर का विकास जो बड़े शहरों से अछूता था, उस उस स्तर पर लाने का प्रयास किया. बाद में उन्होंने सपा का साथ छोड़ दिया, कोरोना काल के समय लोगों की खूब मदद की, उस समय इनकी रसोई चर्चाओं में आ गयी, रोज हजारों लोगों के लिए खाना बनता, उसे घर घर तक पहुँचाया जाता. उनके इस कार्यों ने लोकसभा क्षेत्र में इनकी पकड़ को मजबूत कर दिया. बाद में इन्होने भाजपा का दामन थाम लिया, विधानसभा चुनाव में खूब मेहनत की. इनकी पकड़ गाजीपुर के सर्व समाज है, सवर्ण, ओबीसी, दलित हर समाज में इनके प्रसंसक आपको मिल जायेंगें. यहाँ पर भी भाजपा ने बड़ी गलती की.

राधे मोहन सिंह और विजय मिश्र भाजपा के जीत की चाभी बन सकते थे. अब बात अरुण सिंह की, भाजपा से पुरानी दोस्ती है, जमीन पर पकड़ भी मजबूत है. लेकिन भाजपा ने नज़रअंदाज कर दिया.

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाओं ने मनोज सिन्हा पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए. लोगों में चर्चा थी कि मनोज सिन्हा के बाद राधेमोहन सिंह और विजय मिश्र से बेहतर विकल्प कोई हो नहीं सकता था. लेकिन खबर आई कि टिकट पारसनाथ राय को मिला, वो शिक्षक हैं, शिक्षण संस्थान के प्रबंधक हैं, संघ से जुड़े रहे, लेकिन मुख्य धारा की राजनीति में चर्चा नहीं होती थी. लोगों का दिमाग तब झन्नाया जब ये खबर आई की ये तो मनोज सिन्हा के खास हैं और टिकट इन्ही के कृपा से मिला है. फिर क्या था, लोग दबी जुबान से कहने लगे कि  कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया है, पार्टी के कई नेता नाराज हो गये हैं.

परिणाम आने के बाद पारसनाथ राय गाजीपुर की हर विधानसभा में हार गये यहाँ तक अपने विधानसभा यानि जखनिया में भी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा.

सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा है कि सिन्हा जी ने रुमाल रखकर सीट रोकी थी, परस जीते हारें, बस कोई सीट न कब्ज़ा कर ले, 29 में बेटे को लड़ाने की तमन्ना है, 19 हारे, 24 हारे, बेस टूट चूका है, जम्मू कश्मीर में ठेका पट्टा क्या चल रहा है, IB जाने !!

हमने अपने पहले के विडियो में इन बातों का जिक्र किया था. पारसनाथ राय की मुख्य धारा की राजनीति में अनुभवहीनता ने भी नुकसान पहुँचाया. नंदवंश के नाश वाले उनके बयान इसका प्रमाण दे दिया. मंदिर की राजनीति में जो कुछ वोट आने की सम्भावना भी थी वो खिसक गयी.

अब सवाल है जातीय समीकरण की, मनोज सिन्हा जब थे तो उनकी बात अलग थी लेकिन भाजपा हाईकमान विरादरी का सही समीकरण बनाने में भी चूक गई। करीब 60 हजार वाले भूमिहार मतदाताओं की सीट गाजीपुर से भूमिहार को पैरवी पर टिकट दे दिया गया, जबकि काफी अधिक भूमिहार मतदाता बलिया में हैं। जहूराबाद क्षेत्र के बड़े बड़े गांव व करइल का इलाका बलिया में है। यहां से कुशवाहा या ओबीसी प्रत्याशी होने से ओबीसी का बड़ा वोट बैंक नहीं खिसकता और करारी हार का मुंह नहीं देखना पड़ता।

अब बात भाजपा के मजबूत साथियों की करें तो खबर आई कि प्रभावशाली व्यक्ति ने कई लोगों को हासिए पर कर दिया है। चाहे पूर्व जिलाध्यक्ष सच्चितानंद राय हो, अलका राय हों या फिर विजेंद्र राय। अब ये प्रभावशाली व्यक्ति कौन है क्या मनोज सिन्हा? पता नहीं भईया लेकिन जनता के बीच रहने वाले तीनों नेता आज हासिए पर हैं। क्योंकि विजेंद्र राय व सच्चिदानंद राय का तालमेल उनसे नहीं बैठता है। यहीं वजह है कि विजेंद्र राय व सच्चिदानंद राय घर बैठने को मजबूर हो गए। उन्हें लोकसभा तो छोड़ दीजिए विधानसभा का टिकट नहीं मिला।

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