अयोध्या में रामलला विराजमान हो रहे हैं और पुरे देश के केंद्र में उत्तर प्रदेश है. लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति क्या कहती है? रामजन्मभूमि आन्दोलन के बाद से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का पतन होता चला गया और क्षेत्रीय पार्टियों का कद बढ़ता गया. प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आई लेकिन उसी समय बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद से भाजपा कमजोर पड़ती गयी, वहीँ समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अपने क़दमों को मजबूत कर लिया. एक तरफ एक धड़ा धर्म के रंग डूबा हुआ संघर्ष कर रहा था तो दूसरा धड़ा जाति और आरक्षण के खेल में सत्ता का सुख भोग रहा था. सवाल विकास का था लेकिन धर्म और जाति की राजनीति में विकास शहरों और गाँव तक नहीं पहुँच पा रहा था. 2012 के अखिलेश यादव की सरकार में जब विकास की बात शुरू तो राजनीति ने करवट लिया. कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स के जरिये अखिलेश ने विकास की तस्वीर दिखने की कोशिश जरुर की लेकिन तत्कालीन विपक्ष उनकी सरकार की कमजोर कानून व्यवस्था और माफियों से सम्बन्ध के आरोप लगता रहा. 2014 के बाद केंद्र में पीएम मोदी की सरकार आई और 2017 में उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए, धर्म और विकास के अद्भुद मिलन की अद्भुद प्रस्तुति से यूपी में भाजपा की वापसी हुई . विकास कार्यों के ताबड़तोड़ उद्घाटन और बुलडोज़र की गरज ने यूपी की राजनीतीक इतिहास को बदलते हुए, लगातार भाजपा को ही सत्ता में लाया.
लेकिन पूर्वांचल का इतिहास का इतिहास नहीं बदल सका. यहाँ गाँव के आखिरी व्यक्ति की बात याद आती है कि साहब हमारी औकात हाईवे पर जाने की नहीं है और न ही हमें हाईवे से लखनऊ या दिल्ली जाना है, हमें यहीं बेहतर अस्पताल, स्कूल और रोजगार दे दो, हम अपने परिवार का पालन कर लेंगें, हामे कम से कम गाँव से शहर जाने के लिए बेहतर सड़क ही दे दो.
भाजपा का रंग पुरे यूपी में नज़र आया लेकिन पूर्वांचल की आजमगढ़, बलिया, मऊ और गाजीपुर जनपद में भाजपा का रंग नहीं चढ़ सका. सवाल है कि क्या राम की भक्ति में डूबी जनता इसबार बदल जाएगी? इसके लिए हमें इतिहास को समझना होगा.
गाजीपुर की राजनीती पर नजार डालें तो रामजन्मभूमि आन्दोलन के रंग में तब भी गाजीपुर की जनता रंगी हुई नज़र आई लेकिन जनपद की सीटों पर भाजपा को सफलता मिलती हुई नज़र नहीं आई. यदि लोकसभा चुनाव की बात करें तो यहाँ पर भी यही देखने को मिला. जब भी धर्म की बात हुई तो बहुसंख्यक हिन्दू वाले गाजीपुर लोकसभा सीट पर भाजपा को कामयाबी नहीं मिली.
गाजीपुर की सीट पर भाजपा का सामना जब भी यहाँ के सांसद अफजाल अंसारी से हुआ तो भाजपा को असफलता ही हासिल हुई. 2019 में रामजन्मभूमि पर फैसला आया, लेकिन मोदी लहर में भी गाजीपुर की सीट पर भाजपा नहीं जीत पायी, यही हाल पूर्वांचल के कई सीटों पर रहा.
अब अफजाल अंसारी का आरोप ने है कि वो चुनाव न लड़ पाएं इसके लिए उन्हें बर्बाद करने की कोशिश भी की गयी लेकिन सत्य की जीत हुई और न्याय के दरवाजे पर उनके साथ न्याय हुआ.
गाजीपुर ही क्या पूरा उत्तर प्रदेश श्री राम के रंग में रंगा हुआ है, लेकिन सवाल यही है क्या यहाँ की जनता को लगता है कि धर्म व्यक्तिगत मामला है और हमें अंतिम व्यक्ति के समस्याओं का समाधान चाहिए या राम मंदिर का फायदा भाजपा को मिलेगा?
जब राममंदिर के समारोह को भव्य बनाने के लिए प्रशासन ने अपनी जान फूंक दी हो तो क्या तब भी धर्म व्यक्तिगत मामला रह जायेगा? जब जनता क्या, जेल के कैदी भी राम के रंग में रंग गये हों तो क्या तब भी धर्म व्यक्तिगत मामला रह जायेगा?
राम ने देखा है और राम ने जाना है, इस जनता ने अब इश्वर के जाति को भी पहचाना है, जब धर्म से इश्वर और इश्वर से धर्म की बहस को गंभीर माना है. तब भी विनाश और विकास के अंतर को श्री राम ने पहचाना है. बलात्कार का दंश झेलती नारी, सड़क पर तडपते मानस की दुस्वारी, राम ने देखा है और राम ने जाना है. अब राम आयेंगें तो सब जान जायेंगें… धर्म का इस्तेमाल या जन जन का सम्मान? अब राम ही सच बतायेंगें.
Uttar Pradesh की राजनीति में Shri Ram का रंग, Afzal Ansari का छलका दर्द!

