लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में 38 विशेष अधिनियम (Special Acts) ऐसे हैं, जिनमें पुलिस (Police) को एफआईआर (FIR) दर्ज करने का अधिकार नहीं है। यदि कोई पुलिस अधिकारी गलती से एफआईआर दर्ज कर भी देता है, तो उसे रद्द नहीं किया जाएगा, बल्कि संबंधित विभाग या अधिकृत अधिकारी को भेजा जाएगा, जो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करेंगे।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह आदेश Miscellaneous Application No. 1808/2025 (Sukhveer Goyal vs. State of U.P. and Others) में पारित हुआ। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि पुलिस ने ऐसे अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की, जिसमें उन्हें यह अधिकार नहीं है। अदालत ने इस तर्क को गंभीरता से लिया और कहा कि कुछ विशेष अधिनियमों में जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित विभाग या उनके अधिकारियों को दी गई है। इसलिए पुलिस द्वारा सीधे एफआईआर दर्ज करना कानून के खिलाफ (illegal and without jurisdiction) है।
न्यायालय का आदेश:
अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन विशेष अधिनियमों में पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का अधिकार नहीं है, वहां वह ऐसा नहीं कर सकती। अगर गलती से एफआईआर दर्ज हो भी गई है, तो उसे संबंधित विभाग के सक्षम अधिकारी के पास भेजा जाएगा, जो आगे की कार्रवाई करेगा। न्यायालय ने कहा कि इस प्रक्रिया से किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं होगा, बल्कि कानून का सही पालन सुनिश्चित होगा और कोई भी विभाग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर काम नहीं करेगा।
38 विशेष अधिनियमों की सूची का गठन:
अदालत के निर्देश पर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (प्रॉसीक्यूशन) (Additional Director General of Police – Prosecution), उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के नेतृत्व में वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति गठित की गई। समिति में 21 वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी और 15 विभागों के प्रमुख शामिल थे।
इस टीम ने विधिक अध्ययन के बाद उन 38 विशेष कानूनों की पहचान की, जिनमें पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का अधिकार नहीं है।
संभावित श्रेणियाँ: न्यायालय के निर्णयों में आमतौर पर निम्नलिखित अधिनियम शामिल हो सकते हैं:
- Negotiable Instruments Act, 1881 – Section 138 (चेक बाउंस)
- Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act (NDPS Act)
- Prevention of Corruption Act
- Unlawful Activities Prevention Act (UAPA)
- Protection of Children from Sexual Offences Act (POCSO Act)
- Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act
- Gangster & Anti-Social Activities Prevention Act
- Environmental Laws / Pollution Control Acts
- Cyber Laws / IT Act
- Forest Acts / Wildlife Protection Acts
- अन्य विशेष अपराधों के लिए अधिनियम जैसे स्मगलिंग, जालसाजी आदि
समिति की रिपोर्ट को अदालत में प्रस्तुत किया गया और रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। अदालत ने इस विस्तृत विधिक अध्ययन की सराहना की।
वरिष्ठ अधिकारियों की सराहना:
अदालत ने उन अधिकारियों और अधिवक्ताओं की सराहना की, जिन्होंने मामले में योगदान दिया। प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- विमलेन्दु त्रिपाठी, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता
- कुलदीप सिंह चौहान, अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (A.G.A.)
- दीपेश जुनेजा, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (प्रॉसीक्यूशन)
- श्लोक कुमार, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) बुलंदशहर
सरकार और पुलिस को निर्देश:
अदालत ने राज्य सरकार (State Government) को निर्देश दिया कि इस आदेश की जानकारी प्रदेश के सभी पुलिस अधिकारियों, अभियोजन अधिकारियों और विभागीय प्रमुखों तक तुरंत पहुंचाई जाए। प्रत्येक थाना, पुलिस चौकी और अभियोजन इकाई में आदेश उपलब्ध कराया जाए ताकि भविष्य में किसी भी कानूनी गलती से बचा जा सके। साथ ही अदालत ने 38 अधिनियमों की सूची सार्वजनिक करने और सभी विभागों के साथ साझा करने का निर्देश दिया।
निर्णय का असर:
यह आदेश पुलिसिंग और अभियोजन व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। इससे कानून के सही अनुपालन को बल मिलेगा और अनावश्यक एफआईआर या गलत जांच की संभावनाएं कम होंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी और विशेष अधिनियमों के तहत मामलों में विभागीय जवाबदेही तय होगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय सिर्फ कानूनी आदेश नहीं बल्कि प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम है। अब पुलिस को स्पष्ट रहेगा कि किन अधिनियमों में उसे कार्रवाई का अधिकार है और किन मामलों में नहीं।
निष्कर्ष:
यह आदेश कानून की सीमाओं को परिभाषित करता है और न्यायिक अनुशासन को मजबूत करता है, ताकि भविष्य में किसी भी नागरिक को ऐसी त्रुटियों का सामना न करना पड़े।
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