इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में कौन-सा दृश्य देखकर दंग रह गए लोग?

लखनऊ (Lucknow) में आयोजित जनजाति भागीदारी उत्सव का मंगलवार को आकर्षक और ऐतिहासिक समापन हुआ। देशभर से पहुंचे कलाकारों, लोकनृत्य दलों और पारंपरिक समूहों ने इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान (Indira Gandhi Pratishthan) को सांस्कृतिक उत्सव के अद्भुत रंगों से भर दिया। पूरे कार्यक्रम में विविध जनजातीय परंपराओं का ऐसा संगम दिखाई दिया जिसने उपस्थित दर्शकों को लोकसंस्कृति की गहराई से अवगत कराया। उत्सव में दर्शक भारी संख्या में शामिल हुए, जिससे इस आयोजन के प्रति जनता की बढ़ती रुचि स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

समापन समारोह में जनजातीय कलाकारों का सम्मान, लखनऊ में आयोजित उत्सव की एक दृश्यावली।

समापन समारोह में सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन:
समाप्ति दिवस पर देश के अनेक राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों ने अपनी-अपनी सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और विशिष्ट कला रूप प्रस्तुत किए। यह मंच भारत की जनजातीय परंपराओं की वास्तविक झलक को सामने लाने वाला जीवंत माध्यम बना।

राज्य मंत्री संजीव गोंड का अवलोकन:
कार्यक्रम के दौरान समाज कल्याण राज्य मंत्री संजीव गोंड ने प्रदर्शनी और सांस्कृतिक परंपराओं को नजदीक से देखा। अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh) से आए सांस्कृतिक दल ने राज्य मंत्री का स्वागत अपने पारंपरिक वस्त्र ‘खादा’ और ‘टांगों’ पहनाकर किया, जो पूर्वोत्तर भारत की सम्मान परंपरा का प्रतीक माना जाता है। संजीव गोंड ने कलाकारों की कला संरक्षण भावना की सराहना करते हुए कहा कि प्रदेश में जनजाति समाज के उत्थान और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ निरंतर कार्य कर रहे हैं। उनके अनुसार यह उत्सव केवल कला का आयोजन नहीं, बल्कि विविधता में एकता का संदेश देने वाला आयोजन भी है।

उत्तराखंड की प्रस्तुति ने जीता मन:
उत्तराखंड (Uttarakhand) के कलाकारों ने पर्वतीय संस्कृति की परंपराओं को दर्शाने वाले पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए। उनकी प्रस्तुतियों में प्रकृति, सामुदायिक भावना और सांस्कृतिक त्योहारों की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी, जिसने दर्शकों को हिमालयी संस्कृति की जीवंतता से परिचित कराया।

चित्रकूट का पारंपरिक लोकगीत और नृत्य:
चित्रकूट (Chitrakoot) से आए कलाकारों ने बुंदेलखंड की अनूठी लोक परंपरा पर आधारित प्रस्तुति दी। उन्होंने ‘बुआ को नेग मांगने’ की परंपरा से जुड़ा लोकगीत और नृत्य पेश किया, जो घर में बच्चे के जन्म के अवसर पर की जाने वाली विशेष रस्म का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रस्तुति ने दर्शकों को लोककथाओं और परंपराओं की गहराई में ले जाकर भावनात्मक रूप से जोड़ दिया।

शिल्पकारों और विभागीय टीमों को सम्मान:
कार्यक्रम के बीच जनजाति विकास विभाग, उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान (UP Institute of Folk and Tribal Culture), टीआरआई (TRI) की टीम और विभिन्न शिल्पकारों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर निदेशक जनजाति विकास शिव प्रसाद, टीआरआई के संयुक्त निदेशक आनंद कुमार सिंह, लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी और उपनिदेशक डॉ. प्रियंका वर्मा सहित कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित रहीं।
यह समापन कार्यक्रम न केवल सांस्कृतिक विविधता का उत्सव साबित हुआ बल्कि देश की जनजातीय विरासत और गौरव का भव्य प्रदर्शन भी रहा।


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डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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