धर्म की राजनीति या राजनीति में धर्म? इसके आकार प्रकार भी कई हैं, अद्भुद है और अजीब है. राजनीति देश में एकता और अखंडता बनाये रखने के लिए होनी चाहिए और कोई भी जनप्रतिनिधि हो प्रशासनिक अधिकारी, भारत के एकता और अखंडता की कसम तो खाता ही होगा. तो फिर क्यों ऐसे निर्देश दिए जाते हैं जिससे आमजन के मन नफरत की भावना का जन्म हो. एक विशेष समुदाय का अपमान हो. न जाने किस सोच से और किस भावना से ऐसे फैसले लिए जाते हैं. लेकिन भारत में एक कोर्ट हैं जिसका नाम सुप्रीम कोर्ट है और वहां से लोगो को न्याय की उम्मीद रहती है, हुआ भी वैसा, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर, कांवड़ यात्रा वाले मार्ग नेमप्लेट वाले फरमान पर अंतरिम रोक लगा दी है. यानि फिलहाल ढाबे या ठेले वालों को अपने दूकान पर अपना नाम लिखने की आवयश्कता नहीं होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार के उस निर्देश पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि कांवड़ियों के रूट स्थित भोजनालयों पर मालिकों के नाम प्रदर्शित किए जाने चाहिए. कोर्ट ने कहा कि उन्हें यह भी बताना होगा कि किस तरह का खाना परोसा जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कांवरिया यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों को मालिकों के नाम लिखने के लिए कहने वाले सरकारी निर्देश पर रोक लगा दी है और कांवरिया यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों को मालिकों के नाम लिखने के लिए कहने वाले उनके निर्देश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सरकारों को नोटिस जारी किया है.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है और मामले की सुनवाई 26 जुलाई को तय की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि खाद्य विक्रेताओं को मालिकों और कर्मचारियों के नाम लिखने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.
Supreme Court Petitions Challenging The UP Govt Order Asking Eateries On Kanwariya Route To Put Owners Names

उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा मार्ग में दुकानों पर नाम लिखे जाने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट में एनजीओ एसोशिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स की याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई. याचिका में उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा मार्ग की दुकानों पर मालिकों के नाम और मोबाइल नंबर लिखे जाने वाले आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. जस्टिस ऋषिकेश राय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच में याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी और वकील सीयू सिंह ने पक्ष रखा. याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि यूपी सरकार दुकानदारों पर दबाव डाल रही है कि वो अपने नाम और मोबाइल नंबर डिस्प्ले करें. ये सिर्फ ढाबा तक सीमित नहीं है. रेहड़ी वालों पर भी दबाव बनाया जा रहा है ताकि एक विशेष समुदाय का आर्थिक बहिष्कार किया जा सके. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह स्वैच्छिक है. ये मेंडेटरी नहीं है.
‘यह कोई औपचारिक आदेश नहीं’
याचिकाकर्ताओं के वकील ने जवाब दिया कि पहले प्रेस स्टेटमेंट था और फिर लोगों में आक्रोश दिखने लगा और इस पर कहा कि यह स्वैच्छिक है, लेकिन वे इसका सख्ती से पालन कर रहे हैं। वकील ने कहा कि यह कोई औपचारिक आदेश नहीं है, बल्कि पुलिस सख्त कार्रवाई कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह एक छद्म आदेश है।
‘आर्थिक स्थिति पर चोट पहुंचेगी’
याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने कहा कि अधिकांश लोग बहुत गरीब, सब्जी और चाय की दुकान चलाने वाले हैं और इस तरह के आर्थिक बहिष्कार के कारण उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो जाएगी। इसका पालन न करने पर हमें बुलडोजर की कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
सिंघवी ने यह दलील
सुप्रीम कोर्ट ने सिंघवी से कहा कि हमें स्थिति को इस तरह से नहीं बताना चाहिए कि यह जमीनी हकीकत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाए। इन आदेशों में सुरक्षा और स्वच्छता के आयाम भी शामिल हैं। सिंघवी ने कहा कि कांवड़ यात्रा दशकों से होती आ रही है और मुस्लिम, ईसाई और बौद्ध समेत सभी धर्मों के लोग उनकी यात्रा में मदद करते हैं। अब आप उन्हें बाहर कर रहे हैं।
सिंघवी के तर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा सवाल
सिंघवी ने कहा कि हिंदुओं की ओर से भी बहुत से शुद्ध शाकाहारी रेस्टोरेंट चलाए जाते हैं। इनमें मुस्लिम कर्मचारी भी काम कर सकते हैं। क्या मैं कह सकता हूं कि मैं वहां कुछ भी नहीं खाऊंगा, क्योंकि वहां का खाना किसी न किसी तरह से मुसलमानों या दलितों की ओर से बनाया या परोसा जा रहा है? निर्देश में स्वेच्छा से लिखा है, लेकिन स्वेच्छा कहां है? अगर मैं बताऊंगा तो मैं दोषी हूं और अगर नहीं बताऊंगा तो भी मैं दोषी हूं। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या कांवड़ यात्रा के श्रद्धालु (कांवरियां) भी यह उम्मीद करते हैं कि खाना किसी खास श्रेणी के मालिक द्वारा पकाया जाना चाहिए?