देशभर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर Supreme Court (सुप्रीम कोर्ट) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल जुर्माना भरकर पर्यावरण नियमों के उल्लंघन को नियमित करने की व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती। इस फैसले के साथ केंद्र सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया गया है, जिसके तहत बिना पर्यावरण मंजूरी के शुरू की गई परियोजनाओं को बाद में नियमित करने का रास्ता उपलब्ध था। अदालत के इस निर्णय का प्रभाव Madhya Pradesh (मध्य प्रदेश) समेत पूरे देश में ऐसे मामलों पर पड़ने की संभावना है, जहां परियोजनाएं आवश्यक पर्यावरणीय अनुमति के बिना शुरू की गई थीं।
फैसले में क्या कहा गया है:
Supreme Court (सुप्रीम कोर्ट) ने अपने आदेश में कहा कि अब “प्रदूषण फैलाओ और जुर्माना भरो” जैसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में कोई भी कंपनी, बिल्डर या अन्य परियोजना संचालक यह सोचकर निर्माण कार्य शुरू नहीं कर सकेगा कि बाद में जुर्माना जमा कर आवश्यक पर्यावरण मंजूरी प्राप्त कर ली जाएगी। अदालत के इस फैसले के बाद बिना पूर्व अनुमति के परियोजना शुरू करने की प्रवृत्ति पर सख्ती बढ़ने की उम्मीद है।
2021 का मेमोरेंडम किया गया रद्द:
अदालत ने केंद्र सरकार के वर्ष 2021 के उस मेमोरेंडम को अवैध करार दिया, जिसके माध्यम से बिना पूर्व पर्यावरण मंजूरी शुरू हुई परियोजनाओं को बाद में नियमित करने की व्यवस्था बनाई गई थी। न्यायालय ने कहा कि वर्ष 2006 के वैधानिक पर्यावरण नियमों में केवल एक प्रशासनिक आदेश या मेमोरेंडम के जरिए बदलाव नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में केवल मेमोरेंडम जारी कर नियमों का उल्लंघन करने वालों को राहत नहीं दी जा सकेगी।
2017 की अधिसूचना पर कोर्ट की टिप्पणी:
फैसले में Supreme Court (सुप्रीम कोर्ट) ने 14 मार्च 2017 को जारी अधिसूचना को वैध माना। अदालत के अनुसार यह केवल छह महीने की सीमित अवधि के लिए लाई गई एकमुश्त राहत योजना थी। इसलिए इसे अलग परिस्थितियों में लागू किया गया था और इसे स्थायी व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता।
जनहित परियोजनाओं को राहत:
अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि AIIMS (एम्स) अस्पताल, हवाई अड्डों और सिंचाई परियोजनाओं जैसी सार्वजनिक हित से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को इस फैसले के तहत विशेष सुरक्षा दी गई है। न्यायालय का मानना है कि ऐसी परियोजनाओं को ध्वस्त करने से पर्यावरण और सार्वजनिक हित दोनों को अधिक नुकसान हो सकता है। इसलिए इन मामलों में अलग दृष्टिकोण अपनाया गया है।
अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होगी:
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यदि सरकारी परियोजनाओं में पर्यावरण नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी। अदालत ने संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों के वेतन से भी जुर्माना वसूला जा सकता है। इससे सरकारी स्तर पर भी नियमों के पालन को लेकर जवाबदेही बढ़ने की संभावना है।
मध्य प्रदेश में भी पड़ेगा असर:
Madhya Pradesh Environment Impact Assessment Authority (मध्य प्रदेश एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी) के चेयरमैन SNS Chauhan (एसएनएस चौहान) के अनुसार राज्य में ऐसे कई मामले लंबित हैं, जिनमें परियोजनाओं ने बाद में पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन किया है। अदालत के ताजा फैसले के बाद ऐसे मामलों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है और इन परियोजनाओं को नए कानूनी परिदृश्य के अनुरूप आगे बढ़ना होगा।
#Tags: #SupremeCourt #Environment #Pollution #EnvironmentalClearance #India #MadhyaPradesh #CourtOrder #Builders #Projects
Disclaimer:
यह खबर स्थानीय संवादाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है। यदि कोई आपत्ति है या खबर से संबंधित कोई सूचना देने या अपना पक्ष रखने के लिए हमें ईमेल करें: apnabharattimes@gmail.com।







