मऊ/लखनऊ। घोसी विधानसभा से सपा (SP) के विधायक सुधाकर सिंह का निधन राजनीति जगत के लिए बड़ा झटका बन गया। 67 वर्षीय विधायक की तबीयत तब बिगड़ी, जब वे 17 नवंबर को दिल्ली में आयोजित उमर अंसारी के मैरिज रिसेप्शन (Marriage Reception) से लौटे।
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परिवार के अनुसार 18 नवंबर की रात दिल्ली से वापस आने के बाद उनकी स्वास्थ्य स्थिति अचानक गंभीर हो गई। उन्हें तुरंत लखनऊ के Medanta Hospital में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की टीम लगातार स्थिति पर नजर रखती रही। गुरुवार सुबह उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। इस खबर की पुष्टि उनके बेटे और पूर्व ब्लॉक प्रमुख डॉ. सुजीत सिंह ने की।

राजनीतिक सफर और प्रभावशाली छवि: सुधाकर सिंह का राजनीतिक सफर तीन बार की विधायकी के साथ काफी प्रभावशाली रहा। उपचुनाव में उन्होंने दारा सिंह चौहान को हराकर बड़ी जीत हासिल की थी। वे घोसी क्षेत्र में अपनी सख्त कार्यशैली और जनता से सीधे जुड़े रहने के लिए पहचाने जाते थे। शिवपाल यादव के बेहद करीबी माने जाने वाले सुधाकर सिंह अपने बेबाक तेवरों के चलते सुर्खियों में रहते थे।

घोसी में अंतिम संस्कार की तैयारी: सुधाकर सिंह के परिवार में पत्नी और बेटा डॉ. सुजीत सिंह हैं। उनके अंतिम संस्कार की तैयारी घोसी स्थित पैतृक गांव में की जा रही है। यहां बड़ी संख्या में नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और समर्थक पहुंचने लगे हैं। सपा (SP) ने X पर पोस्ट कर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दे और परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे।

2022 चुनाव और बागी तेवर: सुधाकर सिंह का 2022 का चुनावी सफर काफी चर्चित रहा। नत्थूपुर से शुरुआत करने के बाद वे घोसी विधानसभा सीट से दो बार विधायक बने। 2022 में सपा (SP) ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन अंतिम समय में टिकट बदलकर दारा सिंह चौहान को दे दिया। इसके बाद उन्होंने निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला लिया, हालांकि इसमें उन्हें विजय नहीं मिली।
उपचुनाव में ऐतिहासिक जीत: 2023 में दारा सिंह चौहान के दोबारा भाजपा (BJP) में शामिल होने और विधायकी से इस्तीफे के बाद घोसी में उपचुनाव हुए। इस उपचुनाव में सुधाकर सिंह ने दारा सिंह चौहान को हराकर विधानसभा में मजबूत वापसी की। यह जीत सपा (SP) के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई मानी गई थी, क्योंकि घोसी सीट भाजपा (BJP) और सपा (SP) दोनों के लिए अहम थी।
जनता के मुद्दों पर आक्रामक रुख: अपने तेज-तर्रार और आक्रामक तेवरों के कारण सुधाकर सिंह प्रशासन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाते थे। जनता की समस्याओं को लेकर वे अधिकारियों से सीधे भिड़ने में कभी पीछे नहीं हटते थे। इन्हीं वजहों से उनके खिलाफ कुछ मुकदमे भी दर्ज हुए, हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी।
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