सिवान की धरती पर दो नाम साथ पले — मोहम्मद शहाबुद्दीन और चंद्रशेखर। दोनों में तेज था, दोनों में नेतृत्व की झलक थी। चंद्रशेखर आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली के जेएनयू (JNU) चले गए और समाजवाद की राह पकड़ी, जबकि शहाबुद्दीन ने सिवान की गलियों में सत्ता का रास्ता खोज लिया। उन्होंने स्थानीय जमींदारों और बाहुबलियों से गठजोड़ किया और धीरे-धीरे अपराध और राजनीति का संगम बन गए। 1990 के दशक में वे जेल से भी निर्दलीय चुनाव जीतकर विधायक बने और “सिवान के सुल्तान” कहलाने लगे।
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इसी दौर में देशभर में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और हिंदुत्व की राजनीति ने उबाल लिया। कई राज्यों में दंगे भड़के, जिसमें मुसलमानों को सबसे अधिक नुकसान झेलना पड़ा। बिहार के सिवान में भी इसका असर दिखा। बढ़ते साम्प्रदायिक तनाव के बीच शहाबुद्दीन पर आरोप लगा कि उन्होंने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं पर अत्याचार किए और विरोधियों की आवाज़ दबाई। इसी माहौल प्रतिद्वंदी बने चंद्रशेखर ने CPI (ML) के साथ खड़े होकर इस आतंक के खिलाफ आंदोलन छेड़ा।

सिवान की राजनीति में चंद्रशेखर का दखल बढ़ने लगा था। जेएनयू से निकल कर चंद्रशेखर अब सिवान में भी अपनी लोकप्रियता हासिल कर रहे थे। तभी 31 मार्च 1997 को शहर के जेपी चौक पर चंद्रशेखर की गोली मार कर हत्या कर दी गई। दरअसल, बिहार में बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ माले ने बंद का अह्वान किया था। इसके पक्ष में चंद्रशेखर शहर में नुक्कड़ सभाएं कर लोगों को जागरूक कर रहे थे। शाम के करीब 3 बज रहे थे। जेपी चौक पर सीपीआई(एमएल) के करीब 30-40 कार्यकर्ता जुटे थे।

चंद्रशेखर नुक्कड़ सभा को संबोधित करने वाले थे। तभी अपराधियों ने वहां गोलियां बरसानी शुरू कर दी। अकेले सात गोली चंद्रशेखर को लगी थी। इसके साथ ही सीपीआई एमएल के नेता श्याम नारायण यादव और एक राहगीर भुटेली मियां की भी इसमें मौत हो गई थी। घटना के बाद जेएनयू से हजारों की संख्या में छात्र-छात्राएं सिवान पहुंचे थे। उन्होंने विरोध मार्च निकाला और शहाबुद्दीन पर हत्या का आरोप लगाया। बाद में चंद्रशेखर की मां कौशल्या देवी ने बेटे को इंसाफ दिलाने के लिए लंबी लडाई लड़ी थी।

शहाबुद्दीन का खौफ तब और बढ़ा जब 2001 में पुलिस RJD नेता मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ वारंट लेकर पहुंची। पुलिस अधिकारी संजीव कुमार को शहाबुद्दीन ने थप्पड़ मार दिया और उनके गुर्गों ने पुलिसवालों की जमकर पिटाई की। बाद में जब पुलिस ने प्रतापपुर स्थित उनके घर पर छापा मारा, तो करीब तीन घंटे तक मुठभेड़ चली, जिसमें तीन पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बावजूद शहाबुद्दीन कानून की पकड़ से दूर बने रहे।

2004 में उन्होंने फिर पूरे बिहार को दहला दिया, जब सिवान के व्यापारी चंदा बाबू के परिवार के साथ तेजाब कांड हुआ — उनके दो बेटों सतीश और गिरीश को अपहरण के बाद तेजाब से नहलाकर मार दिया गया, और तीसरा बेटा राजीव किसी तरह बच निकला। यह मामला अदालत में गया, लेकिन गवाही से पहले 2014 में राजीव की भी हत्या कर दी गई।

2005 में जब बिहार में नीतीश कुमार की सरकार आई, तब सिवान के तत्कालीन डीएम सी.के. अनिल और एसपी संजय कटियार ने शहाबुद्दीन के आतंक को खत्म करने की ठान ली। दोनों ने यूपी पुलिस की मदद से प्रतापपुर में भारी पुलिस बल के साथ घेराबंदी की। मुठभेड़ के दौरान शहाबुद्दीन के समर्थकों ने जमकर फायरिंग की और दावा किया गया कि डीएम को बंधक बना लिया गया था। छापेमारी में AK-47, ग्रेनेड, गोला-बारूद और सैन्य उपकरण बरामद हुए।

शहाबुद्दीन को कुछ लोगों में मसीहा की उपाधि भी दी। रॉबिनहुड की तरह वह लोगों की मदद भी करता था। शायद यही कारण है कि कोरोना के समय लोगों ने कहा कि साहब होते ऑक्सीजन की कमी न होती।

शहाबुद्दीन को दिल्ली तिहाड़ जेल में रखा गया। 20 अप्रैल 2021 को जेल ही स्थिति बिगडने पर जांच हुइ तो पता चला कि मोहम्मद शहाबुद्दीन कोरोना पाॅजिटिव हैं। इसके बाद उन्हें दिल्ली के डीडीयू अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां उनकी देखरेख के लिए पुत्र ओसामा मौजूद थे। पत्नी हीना शहाब भी दिल्ली में ही हैं। शहाबुद्दीन को बचाने की कोशिश नाकाम रही। उन्हाेंने 01 मई 2021 को अंतिम सांस ली।

इस तरह खत्म हुई उस व्यक्ति की कहानी, जिसने रंगदारी से शुरुआत की, सत्ता से उफान पाया, और अपराध से अंत लिखा। आज सिवान में दो नाम याद किए जाते हैं —
“चंद्रशेखर”, जो विचार बन गए, और “सिवान का सुल्तान”, जो चेतावनी बन गए।

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Disclaimer: यह लेख मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित खबरों पर आधारित है।