तीर्थ नगरी सोरों में नागा बाबाओ ने शाही शोभायात्रा निकाल कर गंगा में किया स्नान

रिपोर्टर: जुम्मन कुरैशी

कासगंज (Kasganj), उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के प्रमुख तीर्थ स्थल सोरों (Soron) में बुधवार को नागा बाबाओं (Naga Babas) की पारंपरिक शाही स्याही शोभायात्रा (Royal Procession) श्रद्धा और आस्था के अद्भुत संगम के बीच निकाली गई। यह परंपरा करीब 60 वर्षों से लगातार चली आ रही है और इस बार भी धार्मिक वैभव और उत्साह के साथ आयोजित की गई।

शाही शोभायात्रा का आयोजन और मार्ग:
मार्गशीर्ष मेले (Margashirsha Fair) के अवसर पर 13 अखाड़ों (Akharas) के नागा साधु अपने-अपने दल, ध्वज और पारंपरिक स्वरूप के साथ बैंड-बाजों की धुन में आकर्षक झांकियों के साथ आगे बढ़े। रास्ते भर तीर्थ पुरोहितों और श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर शोभायात्रा का उत्साह बढ़ाया। शोभायात्रा हरि की पौड़ी स्थित हरपदीय गंगाकुंड (Harapadiya Gangakund) पहुंचकर सम्पन्न हुई, जहां सभी साधुओं ने पवित्र गंगा (Ganga) में स्नान कर धर्म-अनुष्ठान पूरे किए।

धार्मिक साधना और हैरत भरे करतब:
नागा बाबाओं ने योगासन, कठिन साधना और पारंपरिक अंग-प्रदर्शन के माध्यम से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस दौरान उनके करतब और साधना ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। शोभायात्रा केवल धार्मिक उत्सव का केंद्र नहीं थी, बल्कि यह नागा साधुओं की दिव्य साधना, उनकी परंपरा और सनातन संस्कृति के विराट रूप को भी दर्शाती है।

परंपरा और इतिहास:
सोरों में शाही स्याही शोभायात्रा (Royal Naga Procession) की परंपरा गणेश गिरी बाबा (Ganesh Giri Baba) के समय से चली आ रही है। नागा साधु देशभर के अखाड़ों से यहां आते हैं और बाबा गणेश तथा भगवान वराह (Lord Varah) के दर्शन के बाद गंगा स्नान करते हैं। यह परंपरा विश्व कल्याण (World Welfare) और जन-कल्याण (Public Welfare) की भावना को आगे बढ़ाती है।

सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था:
हालांकि शोभायात्रा का आयोजन बेहद भव्य था, लेकिन स्थानीय प्रशासन (District Administration) द्वारा किसी प्रकार की सरकारी सुविधा नहीं प्रदान की गई। कई साधुओं ने बताया कि गंगा स्नान के दौरान काई और फिसलन की वजह से दुर्घटना का खतरा भी था। प्रशासन और पालिका (Municipality) को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई।

श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया:
सोरों पहुंचे श्रद्धालु और साधु इस आयोजन से अत्यंत प्रभावित रहे। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और नागा साधुओं की परंपरा को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाला आयोजन है।

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