हमारे देश में यदि किसी के साथ अन्याय होता है तो वो कोर्ट पर भरोसा करता है. हमारे यहाँ हत्या का बदला हत्या, तमाचा का बदला तमाचा, इन सब चीजों को अपराध मन जाता है. न्याय का अंतिम दरवाजा कोर्ट होता है.
14 फ़रवरी 2012 को दिल्ली के छावला इलाके में 19 साल की बेटी, ऑफिस से घर जा रही थी. उसका अपहरण कर पहले सामूहिक बलात्कार किया गया, उसके शरीर को सिगरते से जलाया गया, गाड़ी में रखे अवजार से प्रताड़ित किया गया और जब हवस की गर्मी शांत हो गई तो उसके आँखों में तेज़ाब डाल कर मार दिया गया. उस माँ बाप पर क्या गुजरती होगी. बहुत लोग कहते हैं ऐसे अपराध करने वालों को बिच चौराहे पर फांस दिया जाए, ताकि दुनिया के लिए एक नसीहत बन जाए कि इस अपराध की सजा क्या होती है? लेकिन ये तरीका हमारे संविधान और कानून के हिसाब से गलत है और संविधान को मानाने वाला ही देश भक्त कहलाता है. जिस बेटी के साथ ये घटना घटी उसके माँ बाप ने भी कानून का ही रास्ता अपनाया. 12 साल तक क़ानूनी लड़ाई लड़ी, हाई कोर्ट ने रवि, राहुल और विनोद को फंसी की सजा सुनाया, लेकिन माँ बाप को जीवन का वो दर्द मिला जिससे सख्त कानून का सख्त ह्रदय तो नहीं पिघला लेकिन माँ बाप बिघर गए. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों को आज़ाद कर दिया. ये क्यों हुआ? इसमें क्या कानूनी तकनिकी है? ये सामने आना बाकी है. लेकिन बच्चे का दर्द माँ बाप ही समझ सकते हैं. जैसे गाजीपुर में मुख्तार अंसारी के साले सरजील रज़ा का दर्द झलका.
सोमवार को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जेल में बंद मऊ के पूर्व और चर्चित विधायक मुख्तार अंसारी के साले सरजील रज़ा को जमानत के बाद रिहा किया गया. लेकिन इस रिहाई से सरजील को राहत नहीं मिली. बल्कि एक ऐसा पल सबने देखा जो एक सम्पूर्ण परिवार के अहमियत को दर्शाता है. जिला कारागार के बाहर शाम होते ही गहमागहमी बढ़ गई थी। पुलिस टीम अलर्ट मोड पर दिखाई दी। गेट से कुछ दूरी पर सरजील रजा की पत्नी अपने पुत्र को गोद में लेकर खड़ी थी। शाम सात बजे जेल से बाहर आते ही ईडी टीम की अनुमति के बाद पुलिसकर्मियों ने पत्नी को गेट से कुछ दूरी पर बुलाया। इसके बाद सरजील रजा ने अपनी पत्नी और बच्चे से मुलाकात की। इस दौरान कुछ देर के लिए पत्नी और बच्चे को देखकर सरजील की आँखों से आंसू की बूंदें छलक गई. सरजील को कैंसर है.
खैर ईडी की टीम सोमवार शाम गाजीपुर जिला कारागार से रिहाई के बाद सरजील को शाम 7.30 बजे हिरासत में लेकर प्रयागराज रवाना हो गई। इससे पूर्व टीम ने करीब डेढ़ घंटे तक कारागार गेट पर ही कागजी कार्रवाई पूरी की। दरअसल आरोप है कि नंदगंज थाना क्षेत्र के फत्तेहउल्लाहपुर में सरकारी ताल पर कब्जा करने के साथ ताल को पाटकर गोदाम तक आने-जाने के लिए रास्ते का निर्माण करा दिया गया था। इस मामले में नंदगंज थाने में राजस्व विभाग की टीम ने मुख्तार अंसारी की पत्नी आफ्शा अंसारी, साले अनवर शहजाद, सरजील रजा उर्फ आतिफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।
साथ ही गोदाम को कुर्क करके रास्ते को भी ताल की जमीन में खोदवाकर मिलवा दिया था। इसी मामले में बीते सितंबर महीने में सरजील रजा एवं अनवर शहजाद ने न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया था। जहां से दोनों को जिला कारागार भेज दिया गया था। करीब डेढ़ सप्ताह पूर्व प्रयागराज से आई ईडी टीम जिला जेल में बंद सरजील रजा उर्फ आतिफ और अनवर शहजाद से पूछताछ करने के लिए दो दिनों तक गाजीपुर में डटी रही थी। सरजील रजा उर्फ आतिफ के जमानत से जुड़े सभी दस्तावेज कोर्ट के माध्यम से सोमवार को जेल प्रशासन को प्राप्त हो गए थे।
मऊ के पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी के परिवार एवं उनके रिश्तेदारों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। मुख्तार के बेटे व विधायक अब्बास अंसारी की गिरफ्तारी के बाद से ही साले से भी ईडी की हिरासत में पूछताछ होना तय था। सूत्रों के मुताबिक ईडी कई मामलों के साथ दो कंपनियों के फर्जीवाड़े से धन उगाही के मामले में टीम जांच कर रही है। जबकि विकास कंस्ट्रक्शन कंपनी में मुख्तार के दोनों साले अनवर शहजाद और सरजील रजा उर्फ आतिफ हिस्सेदार हैं। ईडी की टीम सरजील रजा उर्फ आतिफ की रिहाई पर पैनी नजर रखी हुई थी।
इधर वर्षों से अपने पिता मुख्तार अंसारी को जेल में देखने वाले अब्बास अंसारी ने अपने माँ पर भी क़ानूनी शिकंजा कसते हुए देखा है और अब विधायक बनने के बाद खुद कानून के रडार पर हैं. अभी अब्बास को ईडी के कई सवालों का जवाब देना है. लेकिन अब्बास के बड़े पिता और गाजीपुर के सांसद अफजाल अंसारी का कहना है कि देश में महंगाई और घट रही घटनाओं को छुपाने के लिए विपक्ष के नेताओं की जाँच हो रही है.
वैसे राजनीति के अजीब रंग हैं. पुर्वंचाल की राजनीति असल खींचतान तो 90 के दशक में ही शुरू हो गई थी. कभी मुख्तार अंसारी और योगी आदित्यनाथ के बिच खींचातानी पर चर्चा होती थी तो कभी मनोज सिन्हा और अफजाल अंसारी के बिच की रणनीति पर. खैर आज योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम हैं और मनोज सिन्हा जम्मू कश्मीर के महामहिम उपराज्यपाल.
सत्ता भी अजीब चीज होती है क्या क्या रंग दिखाती है. कभी समाजवादी पार्टी के लिए सब कुछ करने वाले, अब्बास को भतीजा मानाने वाले ओम प्रकाश राजभर, भाजपा को खूब कोसते थे और जब भाजपा दुबारा सत्ता में आई तो ओम प्रकाश राजभर ने भी अपना रंग बदल दिया. ना वो नेता के हुए, न जनता के और अब तो अब्बास को भी छोड़ दिया.
यही ओम प्रकाश राजभर कभी मुख्तार अंसारी से मिलने के लिए बांदा जेल भी जाया करते थे. खैर राजनीति और कानून. इस पर आपको ही विचार करना है…

