Lucknow: सहारा समूह को लखनऊ हाईकोर्ट (Lucknow High Court) से राहत नहीं मिली है। समूह ने 7 अक्टूबर को लखनऊ नगर निगम (Lucknow Municipal Corporation) की सहारा शहर में की जा रही कार्रवाई को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की बेंच ने 9 अक्टूबर को याचिका पर सुनवाई की और राज्य सरकार तथा नगर निगम से जवाब तलब किया। अदालत ने सहारा शहर के भीतर मौजूद मवेशियों को कान्हा उपवन (Kanha Upvan) ले जाने का निर्देश भी दिया। मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी।
नगर निगम की कार्रवाई को अनुचित बताया:
सहारा समूह की ओर से दायर याचिका में नगर निगम द्वारा जारी आदेशों को अवैध और मनमाना बताया गया है। कंपनी ने 8 और 11 सितंबर 2025 को पारित आदेशों को रद्द करने की मांग की है। याचिका में कहा गया कि निगम ने सहारा शहर में लीज पर दी गई जमीनों और उन पर बनी संपत्तियों में अवैध हस्तक्षेप किया, जबकि इन परिसंपत्तियों पर सहारा का वैध स्वामित्व और विकास अधिकार है।
सिविल कोर्ट में पहले से स्थगन आदेश लागू:
सहारा का कहना है कि इस विवाद से जुड़ा मामला पहले से सिविल कोर्ट (Civil Court) में विचाराधीन है और अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके बावजूद नगर निगम ने कार्रवाई शुरू कर दी, जो न्यायालय के आदेश की अवहेलना है। कंपनी ने यह भी कहा कि कार्रवाई से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
आर्बिट्रेशन में सहारा के पक्ष में निर्णय:
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि मामले में पहले हुई मध्यस्थता (Arbitration) प्रक्रिया में नगर निगम को सहारा के साथ लीज एग्रीमेंट बढ़ाने के निर्देश दिए गए थे। सहारा का कहना है कि निगम ने उस आदेश का पालन नहीं किया और मनमाने तरीके से संपत्तियों में हस्तक्षेप शुरू कर दिया।
नगर निगम ने दी थी जमीन, सहारा ने किया 2480 करोड़ का निवेश:
मामले के अनुसार, नगर निगम ने 22 अक्टूबर 1994 और 23 जून 1995 को गोमती नगर क्षेत्र (Gomti Nagar) में सहारा इंडिया को जमीन पट्टे पर दी थी। इन जमीनों पर कंपनी ने करीब 2480 करोड़ रुपए की लागत से 87 आवासीय और वाणिज्यिक परियोजनाएं विकसित की हैं। सहारा का दावा है कि सभी विकास कार्य नगर निगम की स्वीकृति से किए गए और पट्टा शर्तों का पूर्ण पालन किया गया।
अदालत का आदेश और अगली सुनवाई:
लखनऊ हाईकोर्ट ने मामले की गहन समीक्षा के बाद राज्य सरकार और नगर निगम से विस्तृत जवाब तलब किया। साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सहारा शहर में मौजूद मवेशियों को कान्हा उपवन में सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाए। मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी।
सहारा की रणनीति और कानूनी दावेदारी:
सहारा ने अदालत में यह तर्क दिया कि नगर निगम की कार्रवाई अवैध है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। कंपनी का यह भी कहना है कि सभी संपत्तियों और परियोजनाओं पर उनका वैध अधिकार है और निगम द्वारा किसी भी तरह का हस्तक्षेप अनुचित है। साथ ही आर्बिट्रेशन में भी उनके पक्ष में निर्णय हो चुका है, जिसे निगम ने अनदेखा किया।
निष्कर्ष:
सहारा और लखनऊ नगर निगम के बीच यह मामला हाईकोर्ट में लंबित है। अदालत के आदेश और अगली सुनवाई तक दोनों पक्षों के बीच तनाव बना रहेगा। सहारा समूह ने स्पष्ट किया है कि वह अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हर कानूनी उपाय करेगा।
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डिस्क्लेमर: यह खबर Media Platforms पर दी गई सूचना पर आधारित है।
सहारा को लखनऊ हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत