प्रयागराज (Prayagraj) में चल रहे माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand) के शिष्यों और पुलिस के बीच स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई, जब संगम तट की ओर बढ़ने को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते धक्का-मुक्की शुरू हो गई और मौके पर मौजूद अफसरों से भी तीखी नोकझोंक हुई। हालात बिगड़ते देख पुलिस ने शिष्यों को दौड़ाकर पकड़ लिया और कई लोगों को हिरासत में ले लिया। इस दौरान एक साधु के साथ चौकी में मारपीट किए जाने का आरोप भी सामने आया, जिससे विवाद और गहरा गया।
घटना के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने नाराजगी जाहिर करते हुए अपने शिष्यों को छुड़ाने पर जोर दिया। अफसरों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन वे अपने निर्णय पर अड़े रहे। लगभग दो घंटे तक संगम क्षेत्र और मेला परिसर में गहमा-गहमी का माहौल बना रहा। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस ने अंततः शंकराचार्य के सभी समर्थकों को भी हिरासत में ले लिया, जिससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया।
भीड़ नियंत्रण को लेकर शुरू हुआ विवाद:
जानकारी के अनुसार विवाद की शुरुआत उस समय हुई, जब पुलिस ने भारी भीड़ को देखते हुए शंकराचार्य से रथ से उतरकर पैदल आगे बढ़ने का अनुरोध किया। शिष्यों ने इस बात पर आपत्ति जताई और आगे बढ़ने लगे। इसी दौरान पुलिस और शिष्यों के बीच तीखी बहस हुई, जो कुछ ही देर में धक्का-मुक्की में बदल गई। अफसरों और संतों के बीच हुई इस झड़प ने मेले की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।
हिरासत और कथित मारपीट का आरोप:
धक्का-मुक्की के बाद पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए कई शिष्यों को हिरासत में ले लिया। आरोप है कि एक साधु को चौकी ले जाकर गिरा-गिराकर पीटा गया। इस घटना की खबर फैलते ही संत समाज में नाराजगी बढ़ गई और शंकराचार्य स्वयं मोर्चा संभालने के लिए आगे आ गए। उनका कहना था कि जब तक शिष्यों को रिहा नहीं किया जाएगा, वे आगे नहीं बढ़ेंगे।
पालकी को दूर ले जाने पर बढ़ा आक्रोश:
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने शंकराचार्य की पालकी को संगम से लगभग एक किलोमीटर दूर तक खींचकर ले जाया। इस दौरान पालकी का क्षत्रप टूट गया, जिसे लेकर समर्थकों में आक्रोश फैल गया। उनका आरोप था कि यह सम्मान के खिलाफ है और जानबूझकर ऐसा किया गया। इस घटनाक्रम ने माघ मेले के शांत माहौल को कुछ समय के लिए अशांत कर दिया।
शंकराचार्य के बयान से बढ़ा सियासी तकरार का संकेत:
घटना के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि बड़े-बड़े अधिकारी संतों के साथ मारपीट कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले वे लौटने का मन बना चुके थे, लेकिन अब वे स्नान करेंगे और कहीं नहीं जाएंगे। उनका कहना था कि उन्हें रोका नहीं जा सकता और यह सब ऊपर के आदेश पर किया जा रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार उनसे नाराज है और इसी वजह से अधिकारियों को परेशान करने के निर्देश दिए गए होंगे। उनका कहना था कि महाकुंभ में हुई भगदड़ को लेकर उन्होंने जिम्मेदारों पर सवाल उठाए थे, उसी का बदला अब लिया जा रहा है।
वहीं प्रयागराज DM मनीष कुमार वर्मा ने कहा, “परंपरा के विपरीत संगम पर स्नान करने वे(स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद) बिना अनुमति के अपनी पालकी पर आए थे। उस समय संगम पर बहुत ज्यादा भीड़ थी, बार-बार अनुरोध करने के बाद भी वे बिना अनुमति के यहां आए और अपनी ज़िद पर अड़े रहे, यह गलत था। अन्य कई पहलु भी संज्ञान में आए हैं कि उनके समर्थकों द्वारा बैरियर तोड़े गए और पुलिस के साथ धक्का-मुक्की की गई तो इस पूरे मामले की हम जांच कर रहे हैं… हम सभी पहलुओं की जांच कर विधिक कार्रवाई करेंगे।”
मौनी अमावस्या स्नान के कारण बढ़ी चुनौती:
घटना के दिन माघ मेले में मौनी अमावस्या का विशेष स्नान चल रहा था। संगम तट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मौजूद थी। प्रशासन के अनुसार सुबह नौ बजे तक लगभग डेढ़ करोड़ श्रद्धालु स्नान कर चुके थे और पूरे दिन में यह संख्या तीन करोड़ तक पहुंच सकती थी। इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था।
व्यवस्थाओं के बीच बढ़ा दबाव:
प्रशासन ने मेला क्षेत्र में सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सीसीटीवी (CCTV) कैमरों और ड्रोन के जरिए लगातार निगरानी की जा रही है। लगभग 800 हेक्टेयर में फैले मेला क्षेत्र को सात सेक्टरों में बांटा गया है और आठ किलोमीटर क्षेत्र में अस्थायी घाट बनाए गए हैं। इसके बावजूद संतों और पुलिस के बीच हुई इस झड़प ने व्यवस्थाओं की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया।
श्रद्धा और व्यवस्था के बीच संतुलन की जरूरत:
माघ मेला आस्था और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों के लिए बड़ी परीक्षा माना जाता है। एक ओर करोड़ों श्रद्धालु संगम में स्नान के लिए पहुंचते हैं, तो दूसरी ओर प्रशासन पर शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि संवाद की कमी और आपसी समझ के अभाव में हालात कितनी तेजी से बिगड़ सकते हैं। संत समाज और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता एक बार फिर सामने आई है।
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