New Delhi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैचलर डिग्री से जुड़ा नौ साल पुराना विवाद आखिरकार दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के साथ थम गया। सोमवार को कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आदेश को पलटते हुए साफ कर दिया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) किसी भी छात्र की डिग्री से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है। जस्टिस सचिन दत्ता ने कहा कि विश्वविद्यालय को छात्रों के रिकॉर्ड साझा करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह निजता के अधिकार के दायरे में आता है।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
यह मामला 2016 में सामने आया, जब आरटीआई कार्यकर्ता नीरज कुमार ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से 1978 में बीए पास करने वाले सभी छात्रों का नाम, रोल नंबर, अंक और पास-फेल की जानकारी मांगी। उस वर्ष पीएम नरेंद्र मोदी के भी बीए पास करने का उल्लेख मिलता है।
DU ने इस सूचना को साझा करने से इनकार करते हुए कहा कि यह “व्यक्तिगत जानकारी” है, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। लेकिन CIC ने आदेश दिया कि विश्वविद्यालय यह जानकारी उपलब्ध कराए क्योंकि डिग्री को सार्वजनिक दस्तावेज माना जाता है और विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक संस्था है।
DU का रुख और तर्क
CIC के आदेश को 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। DU ने अपने पक्ष में कहा कि छात्रों की शैक्षणिक जानकारी “फिड्युशियरी कैपेसिटी” यानी भरोसे में रखी गई गोपनीय सूचना है। इसे किसी तीसरे पक्ष को देना छात्रों की निजता का उल्लंघन होगा।
DU का यह भी कहना था कि यदि अदालत चाहे तो रिकॉर्ड दिखाने में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन इसे सार्वजनिक डोमेन में डालना सही नहीं होगा। यह तर्क शुरू से ही विश्वविद्यालय का मजबूत आधार रहा।
कोर्ट में टकराईं दलीलें
इस मामले में दोनों पक्षों ने जोरदार दलीलें दीं।
RTI कार्यकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि परीक्षा परिणाम और डिग्री की जानकारी आमतौर पर विश्वविद्यालय खुद नोटिस बोर्ड, वेबसाइट या अखबारों के जरिए सार्वजनिक करता है। ऐसे में DU को सूचना देने से इंकार नहीं करना चाहिए।
दूसरी तरफ, DU का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि “जिज्ञासा” को आधार बनाकर सूचना नहीं मांगी जा सकती। सूचना का अधिकार कानून (RTI Act) पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है, न कि किसी की डिग्री या निजी विवरण उजागर करने के लिए।
हाईकोर्ट का फैसला और उसका महत्व
सोमवार को आए फैसले में हाईकोर्ट ने DU की दलीलों से सहमति जताई और CIC का आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि छात्रों की निजता और उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड की गोपनीयता बनाए रखना विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी है।
इस निर्णय से साफ हो गया कि किसी भी छात्र की डिग्री या परीक्षा से जुड़ी जानकारी केवल उसकी सहमति से ही सार्वजनिक की जा सकती है।
9 साल पुराना विवाद खत्म
यह विवाद पिछले नौ सालों से चल रहा था और हर सुनवाई में इस पर तीखी बहस होती रही। 24 जनवरी 2017 को हाईकोर्ट ने CIC के आदेश पर रोक लगा दी थी और अब अंतिम रूप से स्पष्ट कर दिया गया कि पीएम मोदी की डिग्री सार्वजनिक नहीं होगी।
दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले ने न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री विवाद पर विराम लगाया, बल्कि यह भी संदेश दिया कि निजता के अधिकार को सूचना के अधिकार से ऊपर रखा जाएगा। अदालत ने माना कि पारदर्शिता की आड़ में किसी की व्यक्तिगत जानकारी उजागर करना उचित नहीं है। यह फैसला भविष्य में विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक मिसाल बनेगा, जहां छात्रों के रिकॉर्ड को गोपनीय रखने की जिम्मेदारी और भी मजबूत होगी।
दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : सार्वजनिक नहीं होगी पीएम मोदी की बैचलर डिग्री