मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए अभियान चलाए गए। पर, पहले चरण के मतदान में ये प्रयास सफल नहीं हो सके। मतदान 5.4 फीसदी कम हो गया। सियासी पंडित इसके पीछे तमाम वजहें गिना रहे हैं। गेहूं की कटाई, सहालग और गर्म हवा के थपेड़े तो जिम्मेदार माने ही जा रहे हैं, स्थानीय राजनीतिक कारणों के चलते भी मतदाताओं में उत्साह नहीं दिखा। हालांकि मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने कहा, अगले चरणों में मतदान बढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे। पहले से किए जा रहे उपायों को और भी प्रभावी बनाएंगे।
मुरादाबाद : एसटी हसन का टिकट कटने से कम दिखा उत्साह
2019 में लोकसभा चुनाव लिए 12 मार्च को आचार संहिता लागू हुई थी। मुरादाबाद में मतदान 23 अप्रैल को हुआ था। इस बार आचार संहिता 18 मार्च को लागू हुई और मतदान 19 अप्रैल को हुआ। दोनों चुनावों में गर्मी कमोबेश एक जैसे ही रही। पिछली बार करीब 66 प्रतिशत मतदान हुआ था और इस बार 62 प्रतिशत। सियासी पंडितों का मानना है कि ऐसे में मतदान पर मौसम का असर पड़ने की दी जा रही दलील उतनी सही नहीं है। उनका मानना है कि इस बार कहीं कोई लहर नहीं थी, इसलिए मतदाता सुस्त रहे।
रामपुर : घरों से कम ही निकले आजम समर्थक मुस्लिम मतदाता
रामपुर सीट पर 55.75 फीसदी मतदान हुआ, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में 64.40 फीसदी मतदान हुआ था। आजम खां की अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी मौलाना मोहिब्बुल्लाह नदवी को लेकर नाराजगी और चुनाव बहिष्कार की अपील को भी राजनीतिक विश्लेषक कम मतदान से जोड़कर देख रहे हैं। उनकी दलील है कि नराजगी की वजह से आजम समर्थकों ने मतदान से परहेज किया। सपा के कई पदाधिकारियों ने भी मतदान से दूरी बनाए रखी। शुक्रवार को अधिकतम तापमान 42 डिग्री सेल्सियस था, जबकि पिछले चुनाव में यहां का तापमान 40 डिग्री से नीचे रहा था। शहरी सीट पर मतदाताओं ने कम दिलचस्पी दिखाई।
पीलीभीत : प्रत्याशियों के बाहरी होने से बेरुखी
मतदान के मामले में पीलीभीत पंद्रह साल पीछे चला गया। सीट पर मतदान प्रतिशत 63.11ही रहा। यह 2019 के मुकाबले 4.30 प्रतिशत कम है। वर्ष 2014 में यहां 62.86 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार के मतदान से अधिक वोट वर्ष 2009 और 1984 में पड़े थे। गर्म हवा के थपेड़ों, प्रशासन के प्रयासों में कमी और वरुण गांधी के समर्थकों की कम सक्रियता को सियासी पंडित कम मतदान की वजह मान रहे हैं। पिछले 35 वर्षों से पीलीभीत सीट पर मेनका और वरुण गांधी का कब्जा रहा है
कैराना : बूथ तक नहीं ला सके वोटर को
कैराना में पिछली बार के मुकाबले पारा नीचे होने के बावजूद मतदान प्रतिशत कम रहा। कैराना सीट पर इस बार 62.46 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि वर्ष 2019 में 67.44 प्रतिशत हुआ था। वर्ष 2019 में मतदान के दिन अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस था। इस बार 19 अप्रैल को यहां अधिकतम तापमान 36 डिग्री सेल्सियस रहा।
बिजनौर : भाजपा की बूथ कमेटियों में नहीं दिखा पहले जैसा उत्साह
बिजनौर लोकसभा क्षेत्र में इस बार करीब 7 प्रतिशत कम मतदान हुआ है। इसके पीछे प्रमुख कारणों में गर्मी के साथ ही शहरी मतदाताओं की उदासीनता व कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी को भी माना जा रहा है। बिजनौर में रालोद से चंदन चौहान प्रत्याशी हैं। भाजपा का सिंबल नहीं होने से पार्टी की बूथ कमेटियों में उत्साह कम नजर आया। मतदाताओं को घर से बुलाकर वोट डलवाने में पीछे रहे।
नगीना : स्थानीय नेताओं में नाराजगी से कम हुआ मतदान
नगीना में इस बार 60.72 प्रतिशत ही मतदान हुआ, जबकि पिछली बार 63.53 प्रतिशत हुआ था। हालांकि, यहां मतदान प्रतिशत गिरने में अहम वजह गर्मी के तल्ख तेवर को माना जा रहा है। भाजपा और सपा से कई नेता टिकट मांग रहे थे। जानकारों का कहना है कि टिकट नहीं मिलने से ये नेता दूसरे को चुनाव लड़ाने में उत्साहित नजर नहीं आए। सपा के उम्मीदवार गांव-गांव पहुंच नहीं बना सके, तो भाजपा के उम्मीदवार से कई जगहों पर नाराजगी भी दिखी।
मुजफ्फरनगर : कार्यकर्ताओं के दिल न मिलने से आई दिक्कत
मुजफ्फरनगर में इस बार गेहूं की कटाई का कार्य 2019 के मुकाबले अधिक चल रहा है। पछुआ हवा से गेहूं की फसल जल्दी पकी और मौसम विभाग ने 19 अप्रैल को बारिश होने की आशंका भी जताई थी। ऐसे में किसान-मजदूर फसल को संभालने में जुटे रहे। वर्ष 2019 की बात करें तो तब एक तरफ अजित सिंह और दूसरी तरफ केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. संजीव बालियान थे। प्रतिष्ठा का चुनाव होने से दोनों ही दलों ने पूरी ताकत झोंक दी थी। इस बार ऐसा प्रतिष्ठा का सवाल नहीं था।
सहारनपुर : कई गांवों में कम निकले मतदाता
सहारनपुर लोकसभा सीट पर इस बार 66.65 प्रतिशत मतदान हुआ। 2019 में यहां 70.87 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2019 और इस बार मतदान के दिन तापमान कमोबेश बराबर ही रहा।
कम मतदान से सभी दलों के माथे पर बल
पहले चरण में मतदान प्रतिशत का गिरना सभी दलों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है, हालांकि सार्वजनिक तौर पर वे यही कह रहे हैं कि इसका नुकसान प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी को होगा। बहरहाल इंडिया और एनडीए अपना-अपना मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए बूथ स्तर पर अधिक सक्रिय हो गए हैं। उनके प्रतिनिधियों के बयान तो कम से कम यही बता रहे हैं। अब यह तो आने वाले चरणों का मतदान ही बताएगा कि वे अपने प्रयासों में कितना सफल हुए। पर, मतदान प्रतिशत गिरने का यह सिलसिला जारी रहा तो इससे राजनीतिक दलों का समीकरण जरूर गड़बड़ाएगा।

