लखनऊ के (KGMU) परिसर में स्थित पांच मजारों को हटाने के लिए नोटिस चस्पा होने के बाद माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। इन मजारों में से तीन बड़ी मजारें ऐसी बताई जा रही हैं, जिनकी वजह से एम्बुलेंस और मरीजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। प्रशासन के अनुसार यह मजारें करीब 3400 वर्गफीट क्षेत्र में फैली हुई हैं। नोटिस जारी होने के बाद धार्मिक संगठनों, स्थानीय नेताओं और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बन गई है, जिससे मामला संवेदनशील हो गया है।
हटाने के नोटिस से बढ़ा तनाव:
(KGMU) प्रशासन का कहना है कि परिसर में मरीजों की सुविधा सर्वोपरि है। जिन मजारों को हटाने का नोटिस दिया गया है, वे अस्पताल के मुख्य मार्ग और आपात सेवाओं के रास्ते में बाधा बन रही हैं। प्रशासन के अनुसार लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं कि एम्बुलेंस को आने-जाने में परेशानी होती है, जिससे मरीजों के इलाज में देरी का खतरा बना रहता है।
मौलानाओं ने दी खुली चुनौती:
नोटिस सामने आने के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं और मजार से जुड़े लोगों में नाराजगी है। कई मौलानाओं ने प्रशासन को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि मजारों को हटाने की कोशिश का विरोध किया जाएगा। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ निर्माण का नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विधायक का सख्त बयान:
स्थानीय विधायक रविदास मेहरोत्रा ने इस कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि मजारों को तोड़ने से पहले बुलडोजर उनके ऊपर से गुजरेगा। उनके बयान के बाद राजनीतिक रंग भी गहराता नजर आ रहा है और यह मुद्दा प्रशासनिक दायरे से निकलकर सियासी बहस में बदल गया है।
मजारों की उम्र पर सबसे बड़ा विवाद:
इस पूरे मामले की धुरी मजारों की उम्र को लेकर है। दरगाह शाहमीना शाह से जुड़े लोगों, (Shia Personal Law Board) के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास और सूफीना निजामी का दावा है कि परिसर में मौजूद कई मजारें 500 से 600 साल पुरानी हैं। उनका कहना है कि यह मजारें (KGMU) के अस्तित्व में आने से पहले की हैं और नवाबी दौर से यहां सूफी परंपरा रही है, जहां इलाज और दुआ साथ-साथ चलते थे।
प्रशासन ने दावों को किया खारिज:
(KGMU) प्रशासन इन दावों को सिरे से खारिज करता है। प्रशासन का कहना है कि जिन मजारों को नोटिस दिया गया है, वे ऐतिहासिक नहीं हैं। जांच में यह सामने आया है कि कुछ मजारें पिछले 30 से 40 साल के भीतर बनाई गईं और बीते डेढ़ साल में उनका विस्तार तेजी से किया गया। प्रशासन के अनुसार यह विस्तार अतिक्रमण की श्रेणी में आता है और कानून के तहत कार्रवाई जरूरी है।
सेवादारों का भावनात्मक पक्ष:
मजारों की देखभाल करने वाले लोग खुद को कटघरे में खड़ा महसूस कर रहे हैं। मजार की सेवादार कैसर जहां कहती हैं कि यह मजार नवाबों के जमाने से है। यहां इलाज के लिए आने वाले मरीज दुआ भी मांगते हैं। उनका दावा है कि कई डॉक्टरों और मरीजों ने खुद मजार की मरम्मत के लिए सहयोग किया है, जिससे यह सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं बल्कि विश्वास का प्रतीक बन गई है।
(Queen Mary Hospital) के सामने मजार का दावा:
(Queen Mary Hospital) के सामने बनी मजार के संचालक मोहम्मद शकील का कहना है कि यहां हर साल उर्स होता है, जिसमें सभी समुदायों के लोग शामिल होते हैं। उनका कहना है कि पहली बार मजार हटाने का नोटिस मिला है और वे इसे गैरकानूनी मानते हैं। हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि अब प्रशासन से टकराव की स्थिति बन चुकी है।
दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप:
शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद ने आरोप लगाया कि सरकार और प्रशासन दोहरा मापदंड अपना रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब थानों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बने धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई नहीं होती, तो सिर्फ मजारों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है। उनके अनुसार यह कार्रवाई तहजीब और सांस्कृतिक विरासत पर हमला है।
विश्वविद्यालय बनने से पहले की मजारों का दावा:
सैयद बाबर अशरफ ने (KGMU) प्रशासन पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नोटिस देने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि जिन मजारों को हटाने की बात कही जा रही है, वे विश्वविद्यालय बनने से पहले की हैं और इन्हें हटाना कानून के खिलाफ है। उन्होंने इसे लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब पर सीधा प्रहार बताया।
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