ट्रामा सेंटर या खंडहर? सच्चाई चौंकाएगी!

रिपोर्टर : जेड. ए. खांन


अलीगढ़। नेशनल हाईवे (National Highway) पर आए दिन होने वाले हादसों में घायलों को समय से उपचार न मिलने के कारण अपनी जान गंवानी पड़ रही थी। इसी गंभीर समस्या को देखते हुए समाजवादी सरकार ने अलीगढ़ के जसरथपुर (Jasrathpur) गांव में ट्रामा सेंटर की स्थापना की थी ताकि सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोगों को तत्काल उपचार मिल सके और उनकी जान बचाई जा सके। लेकिन सरकार बदलने के बाद इस ट्रामा सेंटर की स्थिति बदहाल होती चली गई। बाद में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने इसका शुभारंभ किया और आपातकालीन सभी चिकित्सा सुविधाओं के साथ इसे संचालित किया गया। शुरुआती दौर में चार बेड वाले आईसीयू वार्ड, ऑपरेशन थिएटर, एक्स-रे, पैथोलॉजी, विशेष वार्ड और एम्बुलेंस की सुविधा भी दी गई थी, मगर आज स्थिति यह है कि अधिकांश सुविधाएं बजट के अभाव में बंद पड़ी हैं।
स्वास्थ्य विभाग से संपर्क करने पर अधिकारियों ने इस विषय में बात करने से इनकार किया और कहा कि फिलहाल शासन से कोई बजट नहीं मिला है। जैसे ही बजट आएगा, मरम्मत और सुविधाओं का पुनः संचालन शुरू किया जाएगा। वहीं, सच्चाई उजागर न हो सके इसके लिए ट्रामा सेंटर पर वीडियो रिकॉर्डिंग प्रतिबंधित करने का पोस्टर भी लगा दिया गया है।

ट्रामा सेंटर पर बीमार पड़ी सुविधाएं:
जसरथपुर ट्रामा सेंटर, जो कभी घायल मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होना था, आज खुद उपचार की प्रतीक्षा में है। यहां की हालत इतनी खराब है कि मूलभूत चिकित्सा सुविधाएं तक सुचारू नहीं हैं।

वेंटिलेटर बिना ऑपरेटर के बंद:
ट्रामा सेंटर पर वेंटिलेटर मौजूद है, लेकिन उसे चलाने के लिए ऑपरेटर की नियुक्ति नहीं की गई है। जिसके चलते यह महत्त्वपूर्ण जीवनरक्षक मशीन धूल फांक रही है।

आईसीयू वार्ड में नहीं कोई उपकरण:
चार बेड वाले आईसीयू वार्ड में गद्दों का अभाव है, जिससे सभी बेड खाली पड़े रहते हैं। इसके अलावा, आईसीयू से संबंधित आवश्यक उपकरण और एसी भी उपलब्ध नहीं हैं, जिससे गम्भीर मरीजों के इलाज की व्यवस्था नाममात्र रह गई है।

खराब मशीन से जांच में परेशानी:
ट्रामा सेंटर की बायोकेमेस्ट्री मशीन लंबे समय से खराब पड़ी है। इसकी मरम्मत अब तक नहीं हो सकी है, जिसके कारण खून की जांच में काफी दिक्कतें आ रही हैं और मरीजों को बाहर निजी लैब पर निर्भर रहना पड़ता है।

बिजली और रोशनी की कमी:
सेंटर में कुल 30 पंखे लगे हैं, जिनमें से केवल 20 ही काम कर रहे हैं। वहीं, ट्रामा सेंटर को रोशनी देने के लिए लगाए गए 50 बल्बों में से सिर्फ 5 चालू हैं। शेष सभी बल्ब खराब पड़े हैं, जिससे रात में अस्पताल परिसर अंधेरे में डूबा रहता है।

पानी की सुविधा भी बाधित:
ट्रामा सेंटर में छह शौचालय बने हैं, लेकिन पानी की टंकी क्षतिग्रस्त होने के कारण किसी भी शौचालय में पानी की सुविधा नहीं है। मरीजों और स्टाफ को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है।

बिजली और जनरेटर दोनों बंद:
बिजली की समस्या यहां आम बात है। जनरेटर की अनुपलब्धता के कारण जब बिजली जाती है, तो पूरा ट्रामा सेंटर अंधकार में डूब जाता है।

एम्बुलेंस भी बंद पड़ी:
ट्रामा सेंटर पर तैनात 108 एम्बुलेंस (Ambulance 108) अब ईंटों पर खड़ी है। लंबे समय से रखरखाव न होने के कारण यह भी उपयोग में नहीं लाई जा रही है।

ऑपरेशन थिएटर अधूरा:
ट्रामा सेंटर का ऑपरेशन थिएटर तो तैयार है, लेकिन जरूरी उपकरणों के अभाव में इसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।

जनता में आक्रोश और निराशा:
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस ट्रामा सेंटर से उन्हें आपातकालीन चिकित्सा सहायता की उम्मीद थी, वह खुद बदइंतजामी का शिकार हो गया है। सरकार और विभाग की लापरवाही के कारण यह भवन केवल नाम का सेंटर बनकर रह गया है।



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डिस्क्लेमर: यह खबर स्थानीय संवाददाता/मीडिया प्लेटफार्म या अन्य द्वारा प्राप्त की गई सूचना पर आधारित है।

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