मथुरा में होलिका दहन पर दिखा अद्भुत नज़ारा, जलती होलिका के बीच से निकला पंडा

मथुरा (Mathura) में मंगलवार सुबह फालैन (Falan) गांव में होलिका दहन का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। धधकती आग के बीच से संजू पंडा नामक व्यक्ति बिना किसी चोट के निकल गए। उनके सिर पर गमछा और गले में रुद्राक्ष की माला थी। इस दौरान देश-विदेश से आए लगभग 50 हजार लोग बांके-बिहारी (Banke Bihari) की जय के उद्घोष करने लगे।धधकती होलिका के बीच से निकला संजू पंडा:
करीब 5200 साल पुरानी परंपरा के अनुसार फालैन गांव में यह अनोखा उत्सव मनाया जाता है। मान्यता है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने भक्त प्रह्लाद (Prahlad) को जलाने का प्रयास किया था, लेकिन वे सफल नहीं हुईं। इस बार संजू पंडा ने धधकती होलिका के बीच से पार पाते हुए परंपरा को दोहराया। इससे पहले उनके बड़े भाई मोनू पंडा ने इसे निभाया था।

संजू पंडा ने बताया तैयारी का क्रम:
संजू ने रात में निर्धारित समय पर दीपक जलाया और उसकी लौ ठंडी होने तक जप किया। इसके बाद उन्होंने होलिका में आग प्रज्वलित की। ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4 बजे संजू ने प्रह्लाद कुंड (Prahlad Kund) में स्नान किया। उनकी बहन ने जलती आग के चारों तरफ कलश से जल अर्घ्य दिया। इसके बाद संजू दौड़ते हुए जलती होलिका से सुरक्षित बाहर निकले।

होलिका की संरचना और आग की तीव्रता:
फालैन गांव के निवासी चरण सिंह के अनुसार, होलिका उपलों और लकड़ी से बनाई गई थी। इसका आकार लगभग 20 फीट ऊंचा और 30 फीट चौड़ा था। आग इतनी तेज थी कि 10 फीट दूर तक खड़े रहना भी मुश्किल था। गांव के लोग उपले और लकड़ी जुटाकर होलिका बनाते हैं, वहीं प्रधान राजस्थान से झरबेरिया की लकड़ी मंगाते हैं।

विदेशियों का अनुभव:
जर्मनी से आई सारा ने बताया कि यह अनुभव अद्भुत था और उन्होंने इसे भगवान की शक्ति और मेडिटेशन का परिणाम बताया। डेविड ने योग और स्ट्रांग माइंडसेट का हवाला देते हुए कहा कि यह दृश्य जीवन में पहली बार देखा। इंग्लैंड के जॉन ने इसे पहली बार इंडिया आने पर एक अद्भुत अनुभव बताया।

गांववासियों और दर्शकों की प्रतिक्रिया:
चरण सिंह ने कहा कि पंडा महाराज के दर्शन देखकर सभी हैरान रह गए। माधव ने इसे भगवान के चमत्कार के समान बताया। जयपाल सिंह ने बताया कि वे साइकिल से गांव आए थे और यह देखकर बहुत भावुक हुए।

संजू पंडा का परिवार और परंपरा:
संजू पंडा के पिता सुशील पहले 8 बार और भाई मोनू पंडा 4 बार आग से सुरक्षित निकले हैं। संजू की बहन रजनी ने कहा कि यह प्रभु का आशीर्वाद है और यह घटना भगवान के चमत्कार की तरह है।

संजू पंडा की साधना और व्रत:
संजू ने बताया कि उन्होंने बसंत पंचमी से 45 दिन का व्रत रखा। व्रत के दौरान केवल एक बार फलाहार किया, दिनभर ब्रह्मचर्य का पालन किया और मंदिर पर ही रहे। उन्होंने बताया कि व्रत करने वाला कभी गोवंश की पूंछ नहीं पकड़ता और चमड़े से बनी वस्तुएं इस्तेमाल नहीं करता।

माला और जप की परंपरा:
मोनू पंडा ने बताया कि गांव के प्रह्लाद कुंड से प्रकट हुई माला से कई पीढ़ियां जप करती हैं। होलिका दहन के दिन प्रह्लाद कुंड में स्नान के बाद ही इस माला को धारण कर आग में प्रवेश किया जाता है। संजू इस माला से सुबह और शाम 6-6 घंटे जप करते थे।

संतुलन और आस्था का संदेश:
संजू पंडा के इस अद्भुत परंपरागत कार्य ने सभी को प्रेरित किया कि आस्था, साधना और मनोबल से असंभव को संभव बनाया जा सकता है। यह घटना गांव और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं के लिए उत्साह और आस्था का केंद्र बनी।

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