रिपोर्टर: अनुज कुमार
लखनऊ (Lucknow) स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ पीठ ने बाल कस्टडी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सात साल के बच्चे को सीधे बोर्डिंग स्कूल भेजे जाने पर गंभीर आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया कि माता-पिता के आपसी विवाद में बच्चे का मानसिक और भावनात्मक हित सर्वोपरि होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि किसी भी निर्णय से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि बच्चा माता-पिता से अलगाव की स्थिति को मानसिक रूप से सहन कर सकता है या नहीं।
बोर्डिंग स्कूल भेजने पर जताई आपत्ति:
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अपने आदेश में कहा कि कम उम्र के बच्चे को बोर्डिंग स्कूल भेजना एक संवेदनशील निर्णय है। अदालत ने माना कि इस तरह का फैसला बच्चे के मानसिक विकास और भावनात्मक संतुलन पर गहरा असर डाल सकता है। ऐसे में बिना समुचित जांच और मूल्यांकन के इस दिशा में कदम उठाना उचित नहीं माना जा सकता।
मानसिक हित को बताया सर्वोपरि:
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि माता-पिता के बीच चल रहे विवाद का खामियाजा बच्चे को नहीं भुगतना चाहिए। न्यायालय के अनुसार बाल कस्टडी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक हित होता है। किसी भी प्रकार का निर्णय लेते समय इसी आधार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को बताया आवश्यक:
खंडपीठ ने कहा कि यदि बच्चे को बोर्डिंग स्कूल भेजने पर विचार किया जा रहा है, तो उससे पहले उसका मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य है। विशेषज्ञों द्वारा की गई यह जांच यह बताएगी कि बच्चा माता-पिता से अलग रहकर बोर्डिंग स्कूल के वातावरण में खुद को कैसे ढाल पाएगा। अदालत ने माना कि बिना विशेषज्ञ राय के इस तरह का फैसला जल्दबाजी माना जाएगा।
विशेषज्ञ रिपोर्ट के आधार पर होगा निर्णय:
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर ही लिया जाना चाहिए। मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट से यह सामने आएगा कि बच्चा अलगाव की स्थिति को सहन करने में सक्षम है या नहीं। इसके बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाना न्यायसंगत होगा।
फैमिली कोर्ट को सौंपी जिम्मेदारी:
बोर्डिंग स्कूल भेजने से संबंधित अंतिम निर्णय फैमिली कोर्ट लखनऊ (Family Court Lucknow) पर छोड़ा गया है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि विशेषज्ञों की रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद फैमिली कोर्ट इस मामले में आगे की कार्रवाई करे और बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाए।
खंडपीठ ने की विशेष अपीलों की सुनवाई:
यह फैसला मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली (Arun Bhansali) और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह (Jaspreet Singh) की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने पिता और माता की ओर से दाखिल की गई विशेष अपीलों पर एक साथ सुनवाई की। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए यह आदेश पारित किया।
विवाह और कस्टडी से जुड़ा मामला:
यह पूरा मामला वर्ष 2017 में हुए विवाह और वर्ष 2018 में जन्मे बच्चे की कस्टडी से संबंधित है। माता-पिता के बीच विवाद के चलते बच्चे की परवरिश और भविष्य को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही है। हाईकोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून की दृष्टि में बच्चे का हित किसी भी अन्य पहलू से ऊपर है।
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