गाजीपुर (Ghazipur) के जनपद न्यायालय में पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने एक गंभीर अपराध के मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी को 10 वर्ष के सश्रम कारावास और 25 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई है। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया है कि जुर्माने की आधी राशि पीड़िता को प्रदान की जाएगी। यह फैसला सुहवल थाना क्षेत्र के एक पुराने मामले से जुड़ा है, जिसने उस समय पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया था।
घटना की शुरुआत:
मामला गाजीपुर (Ghazipur) के सुहवल थाना क्षेत्र के एक गांव का है। यहां की रहने वाली एक नाबालिग बालिका अपने पिता के साथ असम (Assam) के डिब्रूगढ़ (Dibrugarh) में लगभग 10 से 15 वर्षों से रह रही थी। वर्ष 2017 में वह अपने पैतृक गांव आई हुई थी। इसी दौरान उसी गांव का रहने वाला एक युवक राजेश राजभर भी गांव आया था। दोनों परिवारों के बीच पहले से ही परिचय था, इसी कारण नाबालिग और आरोपी के बीच बातचीत होने लगी।
आरोपी ने रची साजिश:
अगले ही दिन आरोपी युवक ने नाबालिग को बाजार से सब्जी खरीदने के बहाने अपने साथ चलने को कहा। बालिका उस पर भरोसा कर उसके साथ बाजार चली गई। लेकिन वहां से आरोपी उसे अपने साथ लेकर फरार हो गया। बताया गया कि आरोपी ने लगभग डेढ़ महीने तक नाबालिग के साथ बलात्कार किया।
थाने में मुकदमा दर्ज:
घटना के बाद जब नाबालिग घर नहीं लौटी तो परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। काफी प्रयासों के बाद भी जब कोई पता नहीं चला तो नाबालिग के पिता ने सुहवल थाना (Suhwal Police Station) में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मुकदमा दर्ज किया और जांच शुरू की। जांच पूरी होने के बाद मामले का आरोप पत्र न्यायालय में प्रेषित किया गया।
अदालत में पेश हुए गवाह:
इस मामले की सुनवाई विशेष पॉक्सो कोर्ट (POCSO Court) में हुई। मामले की पैरवी विशेष लोक अभियोजक प्रभु नारायण सिंह ने की। उन्होंने अदालत में कुल 6 गवाहों को पेश किया। सभी गवाहों ने अभियोजन पक्ष के कथन का समर्थन किया और आरोपी के खिलाफ ठोस बयान दिए।
न्यायालय का फैसला:
सभी साक्ष्य और गवाहों के बयान सुनने के बाद पॉक्सो कोर्ट के न्यायाधीश राम अवतार ने आरोपी राजेश राजभर को दोषी ठहराया। न्यायालय ने आरोपी को 10 वर्ष के सश्रम कारावास और 25 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई। साथ ही यह भी आदेश दिया कि जुर्माने की आधी राशि पीड़िता को दी जाएगी ताकि उसकी सहायता हो सके।
आरोपी जेल भेजा गया:
फैसला सुनाए जाने के बाद आरोपी को अदालत से ही जेल भेज दिया गया। न्यायालय का यह निर्णय न केवल पीड़िता के लिए न्याय का प्रतीक है बल्कि यह समाज के लिए भी एक सख्त संदेश है कि ऐसे जघन्य अपराधों के लिए कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।
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