लाठी की चोट से बुझा दिया दीप,
सच पर छा गया सियासत का चीख।
जनता के हक़ में उठी हर पुकार,
पुलिसिया डंडे ने कर दी लाचार।
मौत हुई पर सवाल जिंदा हैं आज,
इंसाफ़ मिलेगा या होगा ये राज़?
भाजपा कार्यकर्ता सियाराम उपाध्याय की मौत की आधिकारिक कहानी कुछ और है, लेकिन चश्मदीद गवाहों और अंदरूनी सूत्रों के बयान सामने आने के बाद यह मामला एक साजिश जैसा लगने लगा है।
गाज़ीपुर के गाठिया गांव में पिछले तीन हफ्तों से ट्यूबवेल के लिए बिजली के तार बिछाने का विवाद चल रहा था। एक किसान ने पड़ोसी की जमीन पर तार खींच दिए। पुलिस ने दोनों पक्षों को थाने बुलाकर काम रोकने का आदेश दिया। लेकिन अगले ही दिन काम फिर से शुरू हुआ। इसके खिलाफ सियाराम उपाध्याय और ग्रामीण थाने के बाहर धरने पर बैठ गए।
इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे इलाके को हिला दिया।
लोगों का आरोप है कि पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिससे उपाध्याय की हालत बिगड़ी और बाद में उनकी मौत हो गई।
चश्मदीदों का दावा:
गांव के लोगों ने बताया कि नोनहरा थाने के बाहर जब सियाराम उपाध्याय और ग्रामीण धरने पर बैठे थे, तभी पुलिस अचानक आक्रामक हो गई।
“पहले धमकाया गया, फिर धक्का-मुक्की हुई और अचानक लाठियां चल पड़ीं।
परिजनों का कहना है कि जब पुलिस ने उन्हें छोड़ा, तब तक उनकी हालत नाजुक हो चुकी थी।
यह महज इत्तफाक़ है या पैटर्न?
सवाल यह है कि आखिर क्यों पिछले 45 दिनों में भाजपा या आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं पर पुलिस कार्रवाई के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं?
30 जुलाई, मुरादाबाद: भाजपा नेता गजेन्द्र सिंह के भाई चेतन सैनी ने आत्महत्या कर ली। आरोप– नगर निगम ने उनकी 20 साल पुरानी दुकान तोड़ दी।
3 सितंबर, बाराबंकी: एसआरएमयू यूनिवर्सिटी के बाहर प्रदर्शन कर रहे एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने किया लाठीचार्ज।
13 सितंबर, गाजीपुर: भाजपा कार्यकर्ता सियाराम उपाध्याय की मौत।
तीनों घटनाओं में कॉमन फैक्टर है—पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई। तीनों घटनाओं में पुलिस की भूमिका संदिग्ध और पीड़ित भाजपा या आरएसएस से जुड़े।
राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं—
“क्या भाजपा कार्यकर्ता अब सत्ता और प्रशासन के बीच ‘कुर्बानी का बकरा’ बन गए हैं?”
सियासी बयानों की जंग
कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने आरोप लगाया—
> “सरकार की नजर में अब अपने ही कार्यकर्ताओं की कोई कीमत नहीं। यह मौतें साफ दिखाती हैं कि लोकतांत्रिक आवाज को कुचलने का खेल चल रहा है।”
वहीं, भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी संगठन के कई लोग खुलकर सवाल नहीं उठा पा रहे, लेकिन नाराजगी अंदर ही अंदर उबल रही है।
जांच या लीपापोती?
सरकार ने मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं और 30 दिन में रिपोर्ट मांगी है। लेकिन विपक्ष और ग्रामीणों का मानना है कि यह जांच सिर्फ लीपापोती होगी।
“हमने पहले भी देखा है—रिपोर्टें बनती हैं, फाइलें बंद होती हैं और सच्चाई दफन कर दी जाती है।” – एक पूर्व भाजपा पदाधिकारी।
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🔥 तीन मौतें, तीन कहानियां, और हर बार पुलिस के दामन पर दाग। सवाल यह है कि क्या यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा या इस बार कोई बड़ा सच सामने आएगा?
डंडों से आवाज़ नहीं दबेगी,
सच्चाई की लौ कभी न बुझेगी।
शहीद हुए जो न्याय की राह,
उनकी गूँजेगी हर इक आह।
सत्ता के खेल से जनता जागेगी,
अन्याय की दीवार अब ढह जाएगी।

