दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहे आबकारी नीति मामले की सुनवाई को लेकर बड़ा निर्णय लिया है। उन्होंने जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को एक विस्तृत पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि वह आगे की कार्यवाही में शामिल नहीं होंगे और कोई दलील भी पेश नहीं करेंगे। यह फैसला उन्होंने अपने अंतःकरण और न्यायिक निष्पक्षता को लेकर उठे सवालों के आधार पर लिया है।
पत्र में जताया सम्मान और पीड़ा:
अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र की शुरुआत न्यायपालिका और न्यायाधीश के पद के प्रति सम्मान जताते हुए की। उन्होंने लिखा कि यह पत्र किसी प्रकार के गुस्से, असम्मान या व्यक्तिगत टकराव के कारण नहीं लिखा गया है, बल्कि यह उनकी पीड़ा, विनम्रता और न्यायपालिका में गहरे विश्वास का परिणाम है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उनका उद्देश्य न्यायिक व्यवस्था में आम लोगों के भरोसे को बनाए रखना है।
न्यायपालिका पर भरोसा बनाए रखने की बात:
पत्र में उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों में जब भी अन्य संस्थाएं कमजोर हुईं, तब देश की जनता ने न्यायपालिका से उम्मीद की है। उन्होंने यह भी लिखा कि न्यायपालिका ने हमेशा संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की है और उनका प्रयास इस संस्था को मजबूत करने का है, न कि इसे कमजोर करने का।
निष्पक्षता को लेकर जताई चिंता:
अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने पहले इस मामले में जज से खुद को अलग करने का अनुरोध किया था, ताकि न्याय न केवल हो बल्कि होता हुआ दिखाई भी दे। 20 अप्रैल 2026 को उनका यह अनुरोध खारिज कर दिया गया, लेकिन इसके बाद भी उनकी आशंकाएं दूर नहीं हो सकीं। उन्होंने कहा कि उनकी वैध चिंताओं को व्यक्तिगत टिप्पणी के रूप में लिया गया, जो उन्हें पीड़ादायक लगा।
सत्याग्रह की भावना से लिया निर्णय:
उन्होंने बताया कि वह महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांत से प्रेरित हैं, जिसमें संवाद, आत्ममंथन और अंततः शांतिपूर्ण विरोध का मार्ग अपनाया जाता है। इसी भावना के तहत उन्होंने यह निर्णय लिया कि वह इस मामले की आगे की सुनवाई में भाग नहीं लेंगे, चाहे वह स्वयं हों या उनके वकील।
हितों के टकराव की आशंका का जिक्र:
पत्र में उन्होंने दो प्रमुख चिंताओं का जिक्र किया। पहली, जज का एक संगठन से सार्वजनिक जुड़ाव और दूसरी, उनके परिवार के सदस्यों का केंद्र सरकार से जुड़े मामलों में वकील के रूप में कार्य करना। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों से हितों के टकराव की आशंका उत्पन्न होती है, जो निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।
न्यायिक उदाहरणों का दिया हवाला:
अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र में पूर्व के कई न्यायिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई न्यायाधीशों ने निष्पक्षता बनाए रखने के लिए स्वयं को मामलों से अलग किया है। उनका मानना है कि इस प्रकार के कदम न्यायपालिका की गरिमा को बढ़ाते हैं और जनता के विश्वास को मजबूत करते हैं।
सुनवाई से दूरी का स्पष्ट ऐलान:
उन्होंने स्पष्ट किया कि अपने अंतःकरण की आवाज सुनते हुए उन्होंने तय किया है कि वह इस मामले की आगे की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह इसके कानूनी परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।
संविधान और न्यायपालिका में विश्वास कायम:
अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र के अंत में दोहराया कि उनका विश्वास संविधान और न्यायपालिका में बना हुआ है। उन्होंने कहा कि उनकी आपत्ति केवल इस विशेष मामले की परिस्थितियों को लेकर है, न कि पूरी न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ।
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