डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान: तीन दशक की साधना से निकला भरोसेमंद चेहरा…

भारतीय लोकतंत्र में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी पहचान केवल पदों या चुनावी आँकड़ों से नहीं होती, बल्कि दशकों की सतत साधना, संगठनात्मक अनुशासन और समाज के प्रति निष्ठा से बनती है। डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान ऐसे ही व्यक्तित्व हैं—जिनकी जीवन‑यात्रा शिक्षा, सामाजिक सेवा, सांस्कृतिक चेतना और राजनीतिक संगठन के संगम से आकार लेती है। यह लेख उनके जीवन, पारिवारिक पृष्ठभूमि, वैचारिक संस्कार, संगठनात्मक दायित्वों और सामाजिक योगदान का एक समग्र, तथ्यपरक और ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करता है।

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक संस्कार

डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ शिक्षा, अनुशासन और राष्ट्रसेवा को जीवन का मूल मूल्य माना गया। उनके पिता स्वर्गीय डॉ. दुर्गा सिंह एक विद्वान व्यक्तित्व थे—जिनकी शैक्षिक उपलब्धियाँ (एम.ए. हिन्दी, संस्कृत तथा एल.एल.बी.) और सामाजिक प्रतिष्ठा ने परिवार में अध्ययनशीलता और सार्वजनिक सेवा की परंपरा को मजबूत आधार दिया। माता स्वर्गीय शकुंतला देवी स्वयं बी.ए.एम.एस. जैसी व्यावसायिक शिक्षा से संपन्न थीं, जिससे घर का वातावरण सेवा‑भाव और मानवीय संवेदना से ओत‑प्रोत रहा।

यह वही परिवेश था जिसने डॉ. चौहान के व्यक्तित्व में अनुशासन, कर्तव्यबोध और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को बचपन से ही रोपित किया। पारिवारिक संस्कारों का प्रभाव उनके निर्णयों, आचरण और सार्वजनिक जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

शिक्षा : बहुआयामी बौद्धिक तैयारी

डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान की शैक्षिक यात्रा उनकी गंभीरता और व्यापक दृष्टि का प्रमाण है। उन्होंने एम.एससी. (केमिस्ट्री), एम.ए. (इकोनॉमिक्स) तथा बी.ए.एम.एस. जैसी विविध और व्यावहारिक विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त की। यह संयोजन केवल डिग्रियों का संग्रह नहीं, बल्कि विज्ञान, अर्थशास्त्र और चिकित्सा—तीनों के माध्यम से समाज को समझने की एक समग्र दृष्टि का निर्माण करता है।

उनकी शिक्षा ने उन्हें तर्कसंगत सोच, नीतिगत समझ और मानवीय संवेदना—तीनों स्तरों पर सक्षम बनाया। यही कारण है कि वे सामाजिक समस्याओं को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, आर्थिक और मानवीय परिप्रेक्ष्य से भी देखते हैं।

छात्र जीवन से संगठनात्मक चेतना

डॉ. चौहान का सार्वजनिक जीवन छात्रावस्था से ही सक्रिय रहा। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ाव के दौरान उन्होंने संगठन की बुनियादी कार्यशैली, अनुशासन और जनसंपर्क की बारीकियाँ सीखीं। यह दौर उनके व्यक्तित्व को जमीनी यथार्थ से जोड़ने वाला सिद्ध हुआ।

आरएसएस के साथ उनका संबंध वैचारिक प्रशिक्षण और सामाजिक समरसता के मूल्यों को आत्मसात करने का माध्यम बना। शाखाओं में सक्रिय सहभागिता, प्रशिक्षण शिविरों में भागीदारी और स्थानीय स्तर पर दायित्वों का निर्वहन—इन सबने उनके नेतृत्व कौशल को क्रमशः परिपक्व किया।

सामाजिक संगठनों में भूमिका और दायित्व

डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्यार्थी परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों में विभिन्न स्तरों पर सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने स्थानीय शाखाओं में शिक्षक के रूप में कार्य किया, संपर्क प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली और संगठनात्मक अभियानों में निरंतर सहभागिता की।

1988 में जनपद बिजनौर में जिला संयोजक की भूमिका और 1993 में मेरठ संभाग में संभाग संयोजक के रूप में दायित्व—ये पद केवल संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ नहीं थे, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद स्थापित करने के अवसर भी थे। इन भूमिकाओं ने उन्हें क्षेत्र की सामाजिक‑आर्थिक चुनौतियों से निकटता से परिचित कराया।

सामाजिक आंदोलनों और संघर्षों का अनुभव

डॉ. चौहान का सार्वजनिक जीवन केवल बैठकों और पदों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अनेक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कई बार जेल जाना, प्रशासनिक प्रतिबंधों के विरोध में गिरफ्तारी देना और वैचारिक संघर्षों में अग्रिम पंक्ति में रहना—ये सभी अनुभव उनके साहस और प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

जेल यात्राएँ किसी भी नेता के जीवन में परीक्षा की घड़ी होती हैं। डॉ. चौहान ने इन परिस्थितियों को धैर्य और दृढ़ता के साथ स्वीकार किया। यह अनुभव उनके व्यक्तित्व को और अधिक परिपक्व बनाता है तथा उन्हें जनभावनाओं से गहराई से जोड़ता है।

राजनीतिक दायित्व और संगठनात्मक विश्वास

राजनीतिक क्षेत्र में डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान को विभिन्न अवसरों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं। उत्तर प्रदेश भारतीय चिकित्सा परिषद में चेयरमैन के रूप में उनका कार्यकाल प्रशासनिक दक्षता और नीतिगत संतुलन का उदाहरण रहा।

इसके अतिरिक्त, अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में संगठनात्मक दायित्वों का निर्वहन—सीमित समय में प्रभावी समन्वय, स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ संवाद और रणनीतिक सहयोग—उनकी कार्यशैली की विशेषता रही। यह भरोसा बताता है कि संगठन उन्हें एक जिम्मेदार और भरोसेमंद कार्यकर्ता के रूप में देखता है।

क्षेत्र से जुड़ाव और जनसंपर्क

डॉ. चौहान की सबसे बड़ी शक्ति उनका जमीनी जुड़ाव है। लगभग तीन दशकों से अधिक समय तक क्षेत्र में निरंतर संपर्क, स्थानीय समस्याओं की समझ और आमजन की अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशीलता—इन गुणों ने उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों में स्वीकार्यता दिलाई है।

गरीब, वंचित, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के साथ संवाद और सहयोग की उनकी परंपरा सामाजिक समरसता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह जुड़ाव किसी अवसर विशेष तक सीमित नहीं, बल्कि निरंतरता और विश्वास पर आधारित है।

पारिवारिक जीवन और व्यक्तिगत संतुलन

सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच डॉ. चौहान ने पारिवारिक संतुलन को भी महत्व दिया। उनका परिवार—दो पुत्र और एक पुत्री—शिक्षा और संस्कारों से युक्त है। पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन साधना उनके व्यक्तित्व की स्थिरता को दर्शाता है।

कार्यशैली : अनुशासन, संवाद और समन्वय

डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान की कार्यशैली में तीन तत्व प्रमुख हैं—अनुशासन, संवाद और समन्वय। वे निर्णय लेते समय तथ्यों पर आधारित दृष्टिकोण अपनाते हैं, सहयोगियों की बात सुनते हैं और संगठनात्मक हितों को प्राथमिकता देते हैं।

उनकी यही शैली उन्हें विभिन्न स्तरों पर स्वीकार्य बनाती है और दीर्घकालिक भरोसे का आधार तैयार करती है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में भूमिका

वर्तमान समय में जब राजनीति में त्वरित लाभ और सतही लोकप्रियता की प्रवृत्ति बढ़ रही है, डॉ. चौहान जैसे व्यक्तित्व दीर्घकालिक प्रतिबद्धता और वैचारिक स्थिरता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका अनुभव, शिक्षा और संगठनात्मक समझ उन्हें समकालीन चुनौतियों के बीच एक संतुलित दृष्टि प्रदान करती है।

एक सतत यात्रा

डॉ. इंद्रदेव सिंह चौहान की जीवन‑यात्रा यह बताती है कि सार्वजनिक जीवन केवल पद या अवसर का नाम नहीं, बल्कि निरंतर साधना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की प्रक्रिया है। शिक्षा, परिवार, संगठन और समाज—इन चार स्तंभों पर खड़ा उनका व्यक्तित्व समय के साथ और अधिक परिपक्व हुआ है।

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